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बागेश्वर जिले में बगैर नशे वाले भांग की खेती की कवायद
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भांग की खेती।
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बागेश्वर। जिले में चरस के बढ़ते कारोबार को देखते हुए पुलिस ने बगैर नशे वाले भांग की खेती कराने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी कई बार बगैर नशे वाली भांग की खेती कराने के लिए नीति बनाने की बात कह चुके हैं। इसके लिए अब एसपी मणिकांत मिश्रा ने विशेषज्ञों से संपर्क किया है।
एसपी मणिकांत मिश्रा ने 30 सितंबर को जिले में कार्यभार ग्रहण किया था। तब से उनके निर्देशन में महीनेभर में 15 किलो से अधिक चरस बरामद की जा चुकी है। एसपी ने स्वयं कपकोट के गांवों में जाकर भांग की फसल भी नष्ट की। एसपी ने बताया कि बगैर नशे वाली भांग की खेती कराने की योजना पर काम किया जा रहा है। बगैर नशे वाले भांग के बीज का सरकार ने प्रमाणीकरण कराया है। एसपी ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट के रूप में भांग की खेती करा रही एक संस्था के सीईओ ने भी उनसे संपर्क किया है। वह जल्द ही बागेश्वर आने वाले हैं। उनसे भी बगैर नशे वाली भांग की खेती पर विचार विमर्श किया किया जाएगा। एसपी ने कहा कि वह बगैर नशे की भांग की खेती कराने का मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाएंगे। सरकार की अनुमति से इस दिशा में अगला कदम उठाया जाएगा। एसपी की पहल रंग लाती है तो चरस के धंधे के लिए बदनाम बागेश्वर में भांग वैध रोजगार का जरिया बनेगी। संवाद
भांग के रेशे से बनेगा सजावटी सामान
बागेश्वर। भांग के रेशे का प्रयोग कई देशों में सजावटी सामान बनाने के लिए किया जा रहा है। पहाड़ में भांग के रेशों से अब भी रसिस्यां बनाई जाती हैं। भांग के बीज का प्रयोग चटनी बनाने के साथ ही सब्जी और मसाले में किया जाता है। भांग के बीज काफी महंगे बिकते हैं। भांग के बीज में नशा नहीं होता है। भांग के बीजों को प्रवासी उत्तराखंडी भी काफी पसंद करते हैं। इसकी तासीर गर्म होती है। जाड़ों में भांग के बीज का अर्क सब्जी में डाला जाता है। इससे आयुर्वेदिक दवाएं भी बनती हैं, लेकिन भांग से बनने वाली चरस ने पहाड़ के लोगों के भोजन का हिस्सा रहे भांग को बदनाम कर दिया है। एमडी आयुर्वेद डॉ. नवीन जोशी बताते हैं कि भांग से दर्दनाशक दवाई बनाई जा रही है। दवाएं टैबलेट और तेल के रूप में उपलब्ध हैं। संवाद
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भांग की कैनाविस रुड्रालिस प्रजाति में नशा नहीं होता है क्योंकि इसमें टेट्रा हाइड्रो केनबिनोल (टीएचसी) का स्तर बहुत कम होता है जबकि पहाड़ में उगने वाली भांग की प्रजाति कैनालिस स्टाइवा और इंडिका में टीएचसी काफी अधिक होता है। - डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद, आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून।
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एसपी मणिकांत मिश्रा ने 30 सितंबर को जिले में कार्यभार ग्रहण किया था। तब से उनके निर्देशन में महीनेभर में 15 किलो से अधिक चरस बरामद की जा चुकी है। एसपी ने स्वयं कपकोट के गांवों में जाकर भांग की फसल भी नष्ट की। एसपी ने बताया कि बगैर नशे वाली भांग की खेती कराने की योजना पर काम किया जा रहा है। बगैर नशे वाले भांग के बीज का सरकार ने प्रमाणीकरण कराया है। एसपी ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट के रूप में भांग की खेती करा रही एक संस्था के सीईओ ने भी उनसे संपर्क किया है। वह जल्द ही बागेश्वर आने वाले हैं। उनसे भी बगैर नशे वाली भांग की खेती पर विचार विमर्श किया किया जाएगा। एसपी ने कहा कि वह बगैर नशे की भांग की खेती कराने का मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाएंगे। सरकार की अनुमति से इस दिशा में अगला कदम उठाया जाएगा। एसपी की पहल रंग लाती है तो चरस के धंधे के लिए बदनाम बागेश्वर में भांग वैध रोजगार का जरिया बनेगी। संवाद
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भांग के रेशे से बनेगा सजावटी सामान
बागेश्वर। भांग के रेशे का प्रयोग कई देशों में सजावटी सामान बनाने के लिए किया जा रहा है। पहाड़ में भांग के रेशों से अब भी रसिस्यां बनाई जाती हैं। भांग के बीज का प्रयोग चटनी बनाने के साथ ही सब्जी और मसाले में किया जाता है। भांग के बीज काफी महंगे बिकते हैं। भांग के बीज में नशा नहीं होता है। भांग के बीजों को प्रवासी उत्तराखंडी भी काफी पसंद करते हैं। इसकी तासीर गर्म होती है। जाड़ों में भांग के बीज का अर्क सब्जी में डाला जाता है। इससे आयुर्वेदिक दवाएं भी बनती हैं, लेकिन भांग से बनने वाली चरस ने पहाड़ के लोगों के भोजन का हिस्सा रहे भांग को बदनाम कर दिया है। एमडी आयुर्वेद डॉ. नवीन जोशी बताते हैं कि भांग से दर्दनाशक दवाई बनाई जा रही है। दवाएं टैबलेट और तेल के रूप में उपलब्ध हैं। संवाद
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भांग की कैनाविस रुड्रालिस प्रजाति में नशा नहीं होता है क्योंकि इसमें टेट्रा हाइड्रो केनबिनोल (टीएचसी) का स्तर बहुत कम होता है जबकि पहाड़ में उगने वाली भांग की प्रजाति कैनालिस स्टाइवा और इंडिका में टीएचसी काफी अधिक होता है। - डॉ. नवीन जोशी, एमडी आयुर्वेद, आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून।