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Uttarakhand: चौनी उदास है...पलायन की आखिरी दस्तक से जनशून्य हो गया पहाड़ी गांव, अंतिम परिवार ने भी छोड़ा घर

Sat, 15 Nov 2025 12:41 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, बागेश्वर
अमर उजाला नेटवर्क, बागेश्वर Published by: हीरा मेहरा Updated Sat, 15 Nov 2025 12:41 PM IST
सार

बागेश्वर जिले में स्थित चौनी गांव अब पूरी तरह से वीरान हो गया है, जहां अंतिम रहवासी परिवार ने भी गांव छोड़ दिया है। कभी 25 परिवारों का घर रहा यह गांव धीरे-धीरे उजड़ता गया और वर्ष 2025 तक यह पूर्ण रूप से खाली हो गया।

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Bageshwar Chauni village population is now zero
बागेश्वर के चमड़थल के चौनी गांव में पलायन के कारण वीरान पड़ी बाखली। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बागेश्वर जिला मुख्यालय से महज 23 किलोमीटर दूर बसे चौनी गांव में आज खामोशी इतनी गहरी है कि अपने कदमों की आवाज भी अजनबी लगती है। कभी खुशहाल बाखली थी। सुबह-शाम चूल्हों से धुआं उठता था। बच्चों की हंसी गूंजती थी। खेतों में हल चलाए जाते थे। आज यह गांव पूरी तरह वीरान है। उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25वें साल में यहां रहने वाला अंतिम परिवार भी दरवाजे पर ताला लगाकर चला गया है।चमड़थल ग्राम पंचायत का यह गांव कभी 25 परिवारों से आबाद हुआ करता था। वर्ष 2015 तक यह संख्या 15 पर आ गई। वर्ष 2025 में गांव की आखिरी रहवासी महिला भी मजबूरी में गांव छोड़ गई।

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संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने इस गांव का जायजा लिया। आंगन में उगीं झाड़ियां साफ कह रही हैं कि पलायन के दैत्य ने इस गांव को खोखला कर दिया है। खुले आकाश के नीचे लटकते केले के फल और सूखते गेंदे के फूल बीते दिनों की बसासत का एहसास कराते हैं।करीब 550 नाली उपजाऊ जमीन अपनों के लाैटने के इंतजार में पड़ी है। कोई आए, हल चलाए, बीज डाले पर कोई नहीं आता। पुराने नक्काशीदार मकान और नए बने लिंटर वाले घर दोनों ही बंद पड़े हैं। कुछ खंडहर हो चुके हैं। बाकी खंडहर होने के कगार पर हैं। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें न मिलने के कारण लोग एक-एक कर गांव छोड़ते चले गए। आज चौनी अपने खाली आंगनों में नीति-निर्धारकों की उदासीनता पर सवाल उठा रहा है। 
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गांव छोड़ने का दर्द

चौनी गांव के इस हालात के लिए गांव से लेकर देश और प्रदेश की नई-पुरानी सरकारें जिम्मेदार हैं। उसी गांव में रहते हुए मैं पूरे क्षेत्र का पहला स्नातक बना था। सुविधाओं की कमी के कारण गांव छोड़ना पड़ा। सुविधाओं के लिए आज भी मेरा संघर्ष जारी है।
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-वंशीधर जोशी, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य

लंबे समय तक गांव में सुविधाएं मिलीं नहीं तो लोग बाहर जाने लगे। कोई दिल्ली में है तो कोई लखनऊ में। पिछले साल तक हमारा परिवार गांव में रहता था। अब हमने भी गांव छोड़कर सड़क के नजदीक मकान बना लिया है। -गणेश चंद्र

गांव से पलायन का मुख्य कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार की सुविधाओं का न होना है। सुविधाएं मिलतीं तो ग्रामीण कीवी, अदरक, माल्टा, नारंगी, हल्दी की खेती, मछली पालन कर आजीविका चला सकते थे। -ललिता प्रसाद जोशी

पलायन रोकथाम योजना के तहत पलायन वाले गांवों का चयन कर वहां रोजगारपरक योजनाएं चलाई हैं। कुछ गांवों में रिवर्स पलायन भी हुआ है। चौनी गांव के खाली होने के कारणों की तलाश के लिए अधिकारियों की बैठक ली जाएगी। गांव को फिर से आबाद कराने के लिए प्रयास किया जाएगा। आरसी तिवारी, सीडीओ, बागेश्वर


यहां देवता बसते हैं... इंसान नहीं

चौनी में साल में एक बार जीवन दौड़ता है। मान्यता है कि ग्रामदेवता व घर के देव भी पैतृक घरों में ही बसते हैं। इसी अटूट विश्वास के साथ हर साल गर्मियों में पलायन कर गए लोग देवताओं की पूजा करने के लिए लौटते हैं। आठ-दस दिनों के लिए गांव में रौनक रहती है। झाड़ियां काटी जाती हैं। रास्ते साफ होते हैं। पुराने घरों में खाना पकाने के लिए चूल्हे जलते हैं। फिर चौनी उसी खामोशी में डूब जाता है जहां दरवाजों पर लगे ताले धूप और बारिश में जंग खाते रहते हैं।

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