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38 साल पहले की आपदा को याद कर सिहर उठते हैं कर्मी गांव के लोग
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बागेश्वर का कर्मी गांव। विज्ञप्ति
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। कपकोट तहसील आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में बारिश, भूस्खलन और बाढ़ ने कई बार उथल-पुथल मचाई है। कर्मी गांव भी आपदा के इन प्रकोपों से बच नहीं सका है।
ग्रामीणों को आज भी 38 साल पहले आई आपदा का डरावना मंजर याद है, जब भूस्खलन के बाद बहकर आई शिला ने गधेरे का प्रवाह रोक दिया था।
इसके बाद गधेरे का पानी गांव के आठ घरों को बहा ले गया। उस हादसे में आठ परिवारों के 36 लोग और उनके मवेशी मारे गए। बहाव की चपेट में आए कई लोगों के शव भी नहीं मिल सके।
23 जुलाई 1983 की वह डरावनी रात थी। दिन से रुक-रुक कर बारिश हो रही थी। शाम तक बारिश तेज होने लगी। रात होने तक बारिश ने अतिवृष्टि का रूप ले लिया। दिन भर के काम धंधों से थके लोग नींद की आगोश में चले गए।
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किसी को भी अहसास नहीं था कि यह बारिश गांव के कई लोगों पर भारी पड़ने वाली है। रात करीब एक बजे गधेरे में तेज गड़गड़ाहट के साथ एक भारी शिला बहकर आई और गधेरे का प्रवाह रोक दिया। गधेरे में पानी की मात्रा काफी तेज थी। अचानक शिला के बीच में आने से गांव के ऊपरी छोर पर तालाब बन गया।
गांव में तब बिजली की सुविधा नहीं थी, जिसके कारण लोग बाहर के हालात का अंदाजा नहीं लगा सके। दो से ढाई बजे के बाद अचानक गांव के एक छोर पर तेज आवाज हुई। जिसे सुनकर पूरे गांव के लोग सिहर गए।
कुछ देर बाद ग्रामीणों की चीख पुकार सुनाई देने लगी। गधेरे के दूसरे छोर पर रहने वाले इसे सुनकर गांव की ओर दौड़े, लेकिन तेज बारिश और अंधेरा होने के कारण हादसे का अंदाजा नहीं लग सका।
दूसरे दिन उजाला होने पर लोगों ने देखा कि भूस्खलन के कारण पहाड़ी से एक भारी शिला बहकर आई और उसने गधेरे का मार्ग रोक दिया, जिससे गधेरा उत्तर दिशा की ओर बसे भयांत तोक की ओर मुड़ गया। पहली शाम तक जहां आबादी बसती थी, सुबह वहां मलबा और पत्थरों का जमावड़ा था।
तोक में बसे आठ मकान गधेरे की भेंट चढ़ चुके थे। दूसरे दिन ग्रामीणों ने मलबे में अपनों को खोजने का प्रयास किया, लेकिन दो-तीन लोगों के क्षत-विक्षत शव ही मिल सके। इस भयावह हादसे में एक हंसता-खेलता गांव आपदा की भेंट चढ़ गया था।
फिर हो सकती है 1983 की घटना की पुनरावृत्ति
बागेश्वर। कर्मी गांव का भुलगधेरा फिर से उस रात जैसे हालात पैदा कर सकता है। यह कहना है गांव के सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह कर्म्याल का।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 की बारिश में चितलिया तोक में भारी भूस्खलन हुआ था, जिससे भुलगधेरा में एक और झील का निर्माण हो गया। वह झील अब गांव पर खतरा बनकर मंडरा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर अतिवृष्टि के कारण कभी झील टूटी तो पूरा गांव उसकी जद में आ सकता है।
हादसे को याद कर सिहर उठती हैं चंद्रा देवी
बागेश्वर। 23 जुलाई रात की उस घटना में चंद्रा देवी ने अपने परिवार के पांच लोगों को खोया था। आज भी उनकी आंखों में उस रात का डर साफ नजर आता है। वह बताती हैं कि उनका एक मकान गधेरे के किनारे था, दूसरा कुछ दूरी पर।
गधेरे का रुख मुड़कर गांव की ओर हुआ उनका मकान सबसे पहले चपेट में आया। हादसे में उनके माता, पिता, दो बहनें और भाई बह गए, जिनका कुछ पता नहीं चल सका। आज भी जब आसमान में बादल छाते हैं तो चंद्रा का मन सिहर उठता है और रह-रह कर वह मनहूस काली रात याद आने लगती है।
भगवत सिंह की जिंदगी का सबसे डरावना मंजर
बागेश्वर। गांव के बुजुर्ग भगवत सिंह कर्म्याल कहते हैं कि भुलगधेरा की मचाई तबाही उनकी जिंदगी का सबसे डरावना मंजर था। ऐसा दृश्य न इससे पहले देखा और न बाद में। प्रकृति की उस डरावनी तस्वीर को याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
जिस तरह से आज विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, उससे प्राकृतिक आपदाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है। डर लगता है कि कहीं विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति मानव जाति के लिए खतरा न बन जाए।
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ग्रामीणों को आज भी 38 साल पहले आई आपदा का डरावना मंजर याद है, जब भूस्खलन के बाद बहकर आई शिला ने गधेरे का प्रवाह रोक दिया था।
इसके बाद गधेरे का पानी गांव के आठ घरों को बहा ले गया। उस हादसे में आठ परिवारों के 36 लोग और उनके मवेशी मारे गए। बहाव की चपेट में आए कई लोगों के शव भी नहीं मिल सके।
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23 जुलाई 1983 की वह डरावनी रात थी। दिन से रुक-रुक कर बारिश हो रही थी। शाम तक बारिश तेज होने लगी। रात होने तक बारिश ने अतिवृष्टि का रूप ले लिया। दिन भर के काम धंधों से थके लोग नींद की आगोश में चले गए।
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किसी को भी अहसास नहीं था कि यह बारिश गांव के कई लोगों पर भारी पड़ने वाली है। रात करीब एक बजे गधेरे में तेज गड़गड़ाहट के साथ एक भारी शिला बहकर आई और गधेरे का प्रवाह रोक दिया। गधेरे में पानी की मात्रा काफी तेज थी। अचानक शिला के बीच में आने से गांव के ऊपरी छोर पर तालाब बन गया।
गांव में तब बिजली की सुविधा नहीं थी, जिसके कारण लोग बाहर के हालात का अंदाजा नहीं लगा सके। दो से ढाई बजे के बाद अचानक गांव के एक छोर पर तेज आवाज हुई। जिसे सुनकर पूरे गांव के लोग सिहर गए।
कुछ देर बाद ग्रामीणों की चीख पुकार सुनाई देने लगी। गधेरे के दूसरे छोर पर रहने वाले इसे सुनकर गांव की ओर दौड़े, लेकिन तेज बारिश और अंधेरा होने के कारण हादसे का अंदाजा नहीं लग सका।
दूसरे दिन उजाला होने पर लोगों ने देखा कि भूस्खलन के कारण पहाड़ी से एक भारी शिला बहकर आई और उसने गधेरे का मार्ग रोक दिया, जिससे गधेरा उत्तर दिशा की ओर बसे भयांत तोक की ओर मुड़ गया। पहली शाम तक जहां आबादी बसती थी, सुबह वहां मलबा और पत्थरों का जमावड़ा था।
तोक में बसे आठ मकान गधेरे की भेंट चढ़ चुके थे। दूसरे दिन ग्रामीणों ने मलबे में अपनों को खोजने का प्रयास किया, लेकिन दो-तीन लोगों के क्षत-विक्षत शव ही मिल सके। इस भयावह हादसे में एक हंसता-खेलता गांव आपदा की भेंट चढ़ गया था।
फिर हो सकती है 1983 की घटना की पुनरावृत्ति
बागेश्वर। कर्मी गांव का भुलगधेरा फिर से उस रात जैसे हालात पैदा कर सकता है। यह कहना है गांव के सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह कर्म्याल का।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 की बारिश में चितलिया तोक में भारी भूस्खलन हुआ था, जिससे भुलगधेरा में एक और झील का निर्माण हो गया। वह झील अब गांव पर खतरा बनकर मंडरा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर अतिवृष्टि के कारण कभी झील टूटी तो पूरा गांव उसकी जद में आ सकता है।
हादसे को याद कर सिहर उठती हैं चंद्रा देवी
बागेश्वर। 23 जुलाई रात की उस घटना में चंद्रा देवी ने अपने परिवार के पांच लोगों को खोया था। आज भी उनकी आंखों में उस रात का डर साफ नजर आता है। वह बताती हैं कि उनका एक मकान गधेरे के किनारे था, दूसरा कुछ दूरी पर।
गधेरे का रुख मुड़कर गांव की ओर हुआ उनका मकान सबसे पहले चपेट में आया। हादसे में उनके माता, पिता, दो बहनें और भाई बह गए, जिनका कुछ पता नहीं चल सका। आज भी जब आसमान में बादल छाते हैं तो चंद्रा का मन सिहर उठता है और रह-रह कर वह मनहूस काली रात याद आने लगती है।
भगवत सिंह की जिंदगी का सबसे डरावना मंजर
बागेश्वर। गांव के बुजुर्ग भगवत सिंह कर्म्याल कहते हैं कि भुलगधेरा की मचाई तबाही उनकी जिंदगी का सबसे डरावना मंजर था। ऐसा दृश्य न इससे पहले देखा और न बाद में। प्रकृति की उस डरावनी तस्वीर को याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
जिस तरह से आज विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है, उससे प्राकृतिक आपदाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है। डर लगता है कि कहीं विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति मानव जाति के लिए खतरा न बन जाए।