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- कंक्रीट के मकानों ने छीन लिया गौरेया का आशियाना

Mon, 19 Mar 2018 11:07 PM IST
Updated Mon, 19 Mar 2018 11:07 PM IST
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- कंक्रीट के मकानों ने छीन लिया गौरेया का आशियाना
बागेश्वर। दुनियां का सबसे सभ्य और बुद्धिमान कहलाने वाला मनुष्य भले ही सुरक्षित छत का इंतजाम किए बिना फुटपाथ पर बच्चे पैदा कर देता हो लेकिन पक्षी घोंसला तैयार करने से पहले प्रजनन नहीं करते हैं। कंक्रीट के भवनों में घोंसला बनाने के लिए स्थान नहीं मिलने से कभी आंगन में फुदकने और चहचहाने वाली गौरेया आज संकट में है। पूरे विश्व में गौरेया की संख्या में लगातार गिरावट आने से उसके विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है।
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गौरेया का परिचय-
गौरेया चिड़िया का वैज्ञानिक नाम पेसर डोमिस्टिकरा है। विश्व के लगभग सभी देशों में चहचहाने वाली इस चिड़िया का मूल स्थान एशिया-यूरोप का मध्य क्षेत्र माना जाता है। भारत में गांवों से लेकर शहरों में गौरेया पाई जाती है। 14 से 16 सेंटीमीटर लंबाई वाली गौरेया का वजन 25 से 30 ग्राम तक होता है। मार्च माह के बाद अगस्त माह तक यह प्रजनन करती है। एक मादा गौरेया दो से पांच अंडे देती है। नर, मादा दोनों मिलकर अंडे की देखभाल करते हैं। गौरेया का भोजन अनाज के दाने और कीड़े मकोड़े हैं। चिड़िया का एक झुंड भोजन की तलाश में एक से दो मील की दूरी तय करता है।
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इन कारणों से संकट में पड़ी गौरेया-
अभी गौरैया की आबादी को लेकर कोई गणना नहीं हुई है, लेकिन पर्यावरणवएिद् और पक्षियों पर अध्ययन करने वाली संस्थाओं की रिपोर्ट को देखा जाय तो पिछले एक दशक में इनकी संख्या में काफी कमी आई है। गौरेया क े घोंसले के लिए पहले घरों की छतों व छज्जों में स्थान छोड़ा जाता था। जब से शहरीकरण शुरू हुआ और लकड़ी व पत्थर का स्थान कंक्रीट के मकानों ने लिया गौरेया को घोंसला बनाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा है। दो दशक पूर्व तक झुंडों में नजर आने वाली यह चिड़िया की संख्या भारत ही नहीं यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफी कम रह गई है।
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ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में भी इस चिड़िया की संख्या गिरी है। नीदरलैंड में इस पक्षी को दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रखा गया है। आज यह पूरे विश्व में रेड सूची में शामिल हो चुकी है। चिड़िया के संकट में आने के कारण वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे राज्य पक्षी घोषित किया था। घोंसला बनारने के लिए भवनों में स्थान न होना, खेतों व अनाज में कीटनाशकों का छिड़काव, कूड़े के कारण फैलते प्रदूषण, भोजन की कमी, मोबाइल टावरों से होने वाले रेडिएशन को भी इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।

ऐसे बच सकती है गौरेया- भवनों में गौरेया के घोंसले के लिए स्थान छोड़े, छतों में दाना व पानी रखें।

गौरेया ऐसा पक्षी है जिसको लोगों के नजदीक रहना पसंद है। गौरेया के लिए खेती का इलाका और सुरक्षित आवास वाला क्षेत्र जरूरी है। पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीणों ने उनके लिए भी आवास बनाए थे। आधुनिक भवनों में स्थान नहीं होने से गौरेया घोंसला नहीं बना पा रही है। पक्षी घोंसला तैयार होने के बाद ही प्रजनन करते हैं। आवास का अभाव गौरेया की संख्या में कमी का सबसे बड़ा व पहला कारण है।
- रामनारायण, पिछले 20 वर्षों से पक्षियों पर अध्ययन कर रहे हिमल प्रकृति संस्था के कार्यकर्ता।
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