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जनरेटर से सिंचाई को मजबूर काश्तकार
Updated Mon, 25 Jun 2018 10:32 PM IST
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बागेश्वर। गोमती नदी के आसपास के गांवों में इन दिनों रोपाई का काम चल रहा है लेकिन सिंचाई नहरों के सूखने के चलते रोपाई प्रभावित हो रही है। किसान महंगे मूल्य पर जनरेटर लगाकर रोपाई करने को मजबूर हैं। सिंचाई विभाग की लापरवाही के चलते किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इन दिनों गरुड़ से लेकर बागेश्वर तक किसान रोपाई का काम कर रहे हैं। नदियों के हेड न बांधने, नहरों की मरम्मत न होने से सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है। जनरेटर वाले 250 रुपये से लेकर 300 रुपये प्रतिघंटा ले रहे हैं। केरोसिन न मिलने के कारण किसान डीजल का मूल्य अलग से चुका रहे हैं। यहां आजीविका का मुख्य साधन खेती है, लेकिन इन हालातों में खेती के लिए किसानों के पसीने छूटने लगे हैं। किसान प्रशासन को लगातार ज्ञापन दे रहे हैं लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। उन्होंने प्रशासन से नहरों की जल्द मरम्मत कर पानी देने की मांग की है।
आय बढ़ाने के दावों पर उठे सवाल
बागेश्वर। एक ओर केंद्र से लेकर राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने के दावे कर रही है। वहीं, यहां किसानों को सिंचाई के लिए पानी तक नहीं मिल पा रहा है। किसान खुद के संसाधनों से सिंचाई की व्यवस्था कर रहे हैं। इससे किसानों की आय बढ़ना तो दूर रहा, उल्टा लागत बढ़ने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। इन हालातों में सरकारी दावों की कलई उतर गई है।
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इन दिनों गरुड़ से लेकर बागेश्वर तक किसान रोपाई का काम कर रहे हैं। नदियों के हेड न बांधने, नहरों की मरम्मत न होने से सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है। जनरेटर वाले 250 रुपये से लेकर 300 रुपये प्रतिघंटा ले रहे हैं। केरोसिन न मिलने के कारण किसान डीजल का मूल्य अलग से चुका रहे हैं। यहां आजीविका का मुख्य साधन खेती है, लेकिन इन हालातों में खेती के लिए किसानों के पसीने छूटने लगे हैं। किसान प्रशासन को लगातार ज्ञापन दे रहे हैं लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। उन्होंने प्रशासन से नहरों की जल्द मरम्मत कर पानी देने की मांग की है।
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आय बढ़ाने के दावों पर उठे सवाल
बागेश्वर। एक ओर केंद्र से लेकर राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने के दावे कर रही है। वहीं, यहां किसानों को सिंचाई के लिए पानी तक नहीं मिल पा रहा है। किसान खुद के संसाधनों से सिंचाई की व्यवस्था कर रहे हैं। इससे किसानों की आय बढ़ना तो दूर रहा, उल्टा लागत बढ़ने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। इन हालातों में सरकारी दावों की कलई उतर गई है।
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