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तीन मुख्यमंत्रियों की घोषणा के बाद भी नहीं मिला राज्य मेले का दर्जा

Haldwani Bureauहल्द्वानी ब्यूरो Updated Fri, 12 Jan 2018 10:50 PM IST
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गणेश उपाध्याय
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बागेश्वर। पवित्र सरयू, गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम पर लगने वाला उत्तरायणी मेला धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस पौराणिक मेले की गरिमा को देखते हुए तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इसे राज्य मेले का दर्जा देने की घोषणा की थी, जो आज तक पूरी नहीं हो सकी है। लोगों ने अब 13 जनवरी को मेले के शुभारंभ पर आ रहे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से उम्मीदें हैं।

मकर संक्रांति के दिन दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु संगम पर डुबकी लगाकर भोलेनाथ को बेलपत्र के साथ जल चढ़ाकर रुद्री पाठ करते हैं। लोगों का विश्वास है कि जो लोग मंदिर में श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं शिवजी उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरी कर देते हैं।

मेला सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी महत्व है। इस त्योहार पर लोग घुघतिया त्यार मनाते हैं। लोग मीठे आटे से बने घुघुते बनाते हैं। सरयू पार के लोग मकर संक्रांति के दिन यानी माघ महीने के पहले दिन त्योहार मनाते हैं, जबकि सरयू वार के लोग इसे दूसरे दिन मनाते हैं।

त्योहार पर विवाहिताएं अपने मायका आती हैं।
मेला व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्व रखता था। पहले जब आज की तरह यातायात की सुविधा नहीं थी। उस समय लोग मेले में पैदल आकर नमक, ऊनी वस्त्र और लोहे बर्तन समेत अन्य वस्तुएं खरीदकर ले जाते हैं।

आज भी मेले में जोहार मुनस्यारी से ऊनी वस्त्र, चंपावत से लोहे के बर्तन और मल्ला दानपुर से रिंगाल से बनी वस्तुओं की काफी मांग रहती है। यह मेला धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक दृष्टि से जितना महत्व रखता है उससे कहीं अधिक ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

गोरी शासन में लोग कुली उतार, बेगार और वर्दायश जैसे काले कानूनों से परेशान थे। 14 जनवरी 1921 को मकर संक्रांति के दिन हजारों क्रांतिवीरों ने कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडेय के नेतृत्व में इन काले कानूनों के रजिस्टरों को सरयू में बहाकर कुली उतार न देने का संकल्प लिया।

लोगों के इस संकल्प से तब अंग्रेजों के पांवों की जमीन खिसक गई थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी लोगों को मिली सफलता पर बधाई देने के लिए 21 जून 1929 को यहां आए थे। मेले की गरिमा को देखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी, डॉ. रमेश पोखरियाल और विजय बहुगुणा ने अपने कार्यकाल में इसे राज्य मेले का दर्जा देने की घोषणा की थी।

लेकिन, उनकी घोषणा आज तक परवान नहीं चढ़ सकी। अब 13 जनवरी को सीएम रावत मेले के शुभारंभ के लिए आ रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि सीएम त्रिवेंद्र वर्षों की इस मुराद को अवश्य पूरा करेंगे।

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