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किशन ने शहीदों के नाम पर तैयार किया शांति वन
Updated Tue, 05 Jun 2018 12:25 AM IST
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बागेश्वर। कंक्रीट के जंगलों की वजह से जंगल और खेती तेजी से सिमटती जा रही है, इससे जहां पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, वहीं कार्बन सहित हवा में घुल रहे खतरनाक रसायन आम जन के लिए भी परेशानी का सबब हैं। ऐसे में पर्यावरण के पहरुओं की बड़ी संख्या में दरकार है, हालांकि अब भी कई लोग हैं, जो पर्यावरण संरक्षण में जुटे हैं, लेकिन इनकी संख्या सीमित है। इन्हीं में से एक नाम बागेश्वर के पर्यावरण प्रेमी किशन का है। वह बंजर जमीन को हरा-भरा करने के प्रयास में जुटे हुए हैं।
ग्राम मंडलसेरा निवासी किशन सिंह मलड़ा एक पीपल के पौधे से पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने वाले किशन सिंह पिछले तीन दशक से लेकर अब तक कुमाऊं भर में 3.5 लाख से अधिक पौधे लगा चुके हैं। पर्यावरण के प्रति किशन का समर्पण ही है कि वर्ष 1990 में उन्होंने निजी भूमि पर पौधों की नर्सरी तैयार कर ली। 15 हेक्टेअर क्षेत्र में देवकी वाटिका, शहीदों के नाम पर शांति वन विकसित किया है। पर्यावरण सुरक्षा, अधिक वन विकसित करने को लेकर किशन की लगन ही है कि जहां कभी चीड़ के पेड़ होते थे, वहां पर चंदन की खुशबू भी महक रही है। मलड़ा कहते हैं कि पेड़-पौधों की कमी के कारण ही आज पानी की समस्या पैदा हुई है। यदि भविष्य में पानी के संकट को कम करना है तो पेड़ों, वनों की सुरक्षा करनी होगी।
किशन की नर्सरी में रुद्राक्ष, चंदन के पौधे
बागेश्वर। पर्यावरण प्रेमी किशन सिंह मलड़ा की नर्सरी में चौड़ी पत्ती प्रजाति के दर्जनों पौधे तो हैं ही यहां मैदानी क्षेत्रों में उगने वाले चंदन, रुद्राक्ष के पौधे भी हैं। नर्सरी में रुद्राक्ष, चंदन, थुनेर, अर्जुन, कदंब, नागकेशर, बेंत, शहतूत, बरगद, तेजपत्ता, वट, शिलिंग, पीपल सहित 80 प्रजाति के पौधे लगे हैं। खास बात यह भी है कि किशन अब रुद्राक्ष, चंदन की नई नर्सरी के लिए स्थानीय पेड़ों से ही बीज एकत्र करते हैं।
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ग्राम मंडलसेरा निवासी किशन सिंह मलड़ा एक पीपल के पौधे से पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने वाले किशन सिंह पिछले तीन दशक से लेकर अब तक कुमाऊं भर में 3.5 लाख से अधिक पौधे लगा चुके हैं। पर्यावरण के प्रति किशन का समर्पण ही है कि वर्ष 1990 में उन्होंने निजी भूमि पर पौधों की नर्सरी तैयार कर ली। 15 हेक्टेअर क्षेत्र में देवकी वाटिका, शहीदों के नाम पर शांति वन विकसित किया है। पर्यावरण सुरक्षा, अधिक वन विकसित करने को लेकर किशन की लगन ही है कि जहां कभी चीड़ के पेड़ होते थे, वहां पर चंदन की खुशबू भी महक रही है। मलड़ा कहते हैं कि पेड़-पौधों की कमी के कारण ही आज पानी की समस्या पैदा हुई है। यदि भविष्य में पानी के संकट को कम करना है तो पेड़ों, वनों की सुरक्षा करनी होगी।
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किशन की नर्सरी में रुद्राक्ष, चंदन के पौधे
बागेश्वर। पर्यावरण प्रेमी किशन सिंह मलड़ा की नर्सरी में चौड़ी पत्ती प्रजाति के दर्जनों पौधे तो हैं ही यहां मैदानी क्षेत्रों में उगने वाले चंदन, रुद्राक्ष के पौधे भी हैं। नर्सरी में रुद्राक्ष, चंदन, थुनेर, अर्जुन, कदंब, नागकेशर, बेंत, शहतूत, बरगद, तेजपत्ता, वट, शिलिंग, पीपल सहित 80 प्रजाति के पौधे लगे हैं। खास बात यह भी है कि किशन अब रुद्राक्ष, चंदन की नई नर्सरी के लिए स्थानीय पेड़ों से ही बीज एकत्र करते हैं।
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