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खेलना छोड़कर परिवार के लिए पानी जुटाने को मजबूर बचपन
Updated Mon, 19 Mar 2018 11:04 PM IST
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बागेश्वर। जिले की खरेही पट्टी दशकों से गंभीर जल संकट से जूझ रही है। यहां पर लोगों को वर्ष भर जल संकट से जूझना पड़ता है। गर्मी का मौसम शुरू होते ही यह संकट विकराल हो जाता है। हालात यह होते हैं कि नन्हें मुन्ने बच्चों को भी पढ़ाई व खेलना छोड़कर परिवार के सदस्यों के साथ पानी ढोना पड़ता है। यही हाल कांडा क्षेत्र के गांवों में भी है।
जिले की खरेही पट्टी की 30 हजार की आबादी के लिए जरूरत का पानी नहीं है। यहां के शत प्रतिशत परिवार खेती व पशुपालन से जुड़े हैं। लोगों को अपने पेयजल के साथ ही मवेशियों के लिए भी पानी जुटाना पड़ता है। बोहाला क्षेत्र में वर्ष भर जल संकट बना रहता है। धूराफाट-बौड़ी पेयजल योजना क्षेत्र की पूरी आबादी की प्यास बुझाने में सक्षम नहीं है।
ऐसे में यहां के अधिकांश परिवार नौले-धारों पर निर्भर रहते हैं। गर्मी का मौसम आते ही लोगों की परेशानी और अधिक बढ़ जाती है। परिवार और मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए परिवार के बड़े-बूढ़ों को ही नहीं बच्चों को भी खेलना व पढ़ाई छोड़कर पानी का इंतजाम करने में जुटना पड़ता है। सामाजिक कार्यकर्ता महिपाल सिंह ने बताया कि उनके क्षेत्र के अधिकांश स्रोतों में पानी की कमी हो गई है। यही हाल कांडा क्षेत्र में भी है। कांडा पड़ाव में पिछले एक दशक में आबादी तो काफी बढ़ी है लेकिन नई पेयजल योजनाओं का निर्माण नहीं किया गया।
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जरूरत के अनुसार पानी की योजनाएं नहीं बनी हैं। पूर्व में बनी पेयजल योजनाएं प्यास बुझाने में सक्षम नहीं हैं। गर्मियों में योजनाओं में पानी कम हो जाता है। ऐसे में हैंडपंप या दूर दराज स्थित नौले धारों से अधिकांश समय पानी जुटाने में ही बीत जाता है। कांडा क्षेत्र के लिए पंपिंग योजना का निर्माण किया जाना चाहिए।
- दीप चंद्र, कांडा।
गांवों की पेयजल समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। अधिकांश परिवार खेती किसानी से जुड़े हैं। लोगों को अपने साथ ही पालतू पशुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। नलों में पानी नहीं आने पर लोगों को दूर दराज से पानी की आपूर्ति करनी पड़ती है। सरकार को गांवों में पेयजल के साथ ही सिंचाई के इंतजाम भी करने चाहिए।
- नीमा वर्मा, कांडा।
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जिले की खरेही पट्टी की 30 हजार की आबादी के लिए जरूरत का पानी नहीं है। यहां के शत प्रतिशत परिवार खेती व पशुपालन से जुड़े हैं। लोगों को अपने पेयजल के साथ ही मवेशियों के लिए भी पानी जुटाना पड़ता है। बोहाला क्षेत्र में वर्ष भर जल संकट बना रहता है। धूराफाट-बौड़ी पेयजल योजना क्षेत्र की पूरी आबादी की प्यास बुझाने में सक्षम नहीं है।
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ऐसे में यहां के अधिकांश परिवार नौले-धारों पर निर्भर रहते हैं। गर्मी का मौसम आते ही लोगों की परेशानी और अधिक बढ़ जाती है। परिवार और मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए परिवार के बड़े-बूढ़ों को ही नहीं बच्चों को भी खेलना व पढ़ाई छोड़कर पानी का इंतजाम करने में जुटना पड़ता है। सामाजिक कार्यकर्ता महिपाल सिंह ने बताया कि उनके क्षेत्र के अधिकांश स्रोतों में पानी की कमी हो गई है। यही हाल कांडा क्षेत्र में भी है। कांडा पड़ाव में पिछले एक दशक में आबादी तो काफी बढ़ी है लेकिन नई पेयजल योजनाओं का निर्माण नहीं किया गया।
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जरूरत के अनुसार पानी की योजनाएं नहीं बनी हैं। पूर्व में बनी पेयजल योजनाएं प्यास बुझाने में सक्षम नहीं हैं। गर्मियों में योजनाओं में पानी कम हो जाता है। ऐसे में हैंडपंप या दूर दराज स्थित नौले धारों से अधिकांश समय पानी जुटाने में ही बीत जाता है। कांडा क्षेत्र के लिए पंपिंग योजना का निर्माण किया जाना चाहिए।
- दीप चंद्र, कांडा।
गांवों की पेयजल समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। अधिकांश परिवार खेती किसानी से जुड़े हैं। लोगों को अपने साथ ही पालतू पशुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। नलों में पानी नहीं आने पर लोगों को दूर दराज से पानी की आपूर्ति करनी पड़ती है। सरकार को गांवों में पेयजल के साथ ही सिंचाई के इंतजाम भी करने चाहिए।
- नीमा वर्मा, कांडा।