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आजाद के अचूक निशाने के ‘गवाह’ की मौत
दुगड्डा (कोटद्वार)/जगमोहन सिंह
Updated Sat, 30 Mar 2013 11:31 AM IST
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जिस महान क्रांतिकारी के निशाने का लोहा पूरी अंग्रेज सरकार मानती थी, उसी की निशानेबाजी का गवाह रहा कौला का पेड़ (स्मृति वृक्ष) अंधड़ से नेस्तनाबूद हो गया। दुगड्डा वन रेंज में इस कौला के पेड़ पर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के कहने पर गोलियां चलाकर अपने अचूक निशाने का प्रदर्शन किया था।
आजादी के नायक रहे क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के अचूक निशाने के गवाह स्मृति वृक्ष का बचाखुचा हिस्सा भी ढह गया। ऐसे में यह स्मृति वृक्ष अब स्मृतियों में ही सिमट कर रह जाएगा। दुगड्डा से मात्र दो किमी की दूरी पर शहीद चंद्रशेखर आजाद का स्मृति वृक्ष वैसे तो 12 मई 2006 को ही टूट चुका था।
शासन-प्रशासन स्तर पर उस वृक्ष के संरक्षण के लिए उचित प्रयास नहीं किए गए। जिससे वह समय-समय पर टूटता गया। पिछले दिनों चली तेज अंधड़ में उसका बचाखुचा हिस्सा भी धराशायी हो गया। यदि समय पर इस वृक्ष का संरक्षण किया होता तो यह सुरक्षित रखा जा सकता था।
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क्या है स्मृति वृक्ष की कहानी
वर्ष 1930 में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों सहित दुगड्डा के नाथूपुर क्षेत्र में भूमिगत रहे थे। आजाद का निशाना अचूक था। काफी दिन यहां रहने के बाद जब वह वापस जा रहे थे तो उनके साथियों ने आजाद को उनका अचूक निशाना दिखाने को कहा।
साथियों के कहने पर आजाद ने अपनी पिस्टल निकाली और काफी दूर एक वृक्ष पर कई राउंड फायर किए। सभी सटीक निशाने पर लगे। आजादी के बाद यह वृक्ष स्मृति वृक्ष के नाम से जाना जाने लगा था।
क्या कहना है अधिकारियों का
वृक्ष के स्थान पर उसी प्रजाति का दूसरा वृक्ष लगाया गया है। जिससे लोगों को उससे प्रेरणा मिलती रहे। स्मृति वृक्ष के अवशेषों को संरक्षित रखने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- सोहन लाल थपलियाल, रेंज अधिकारी दुगड्डा
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आजादी के नायक रहे क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के अचूक निशाने के गवाह स्मृति वृक्ष का बचाखुचा हिस्सा भी ढह गया। ऐसे में यह स्मृति वृक्ष अब स्मृतियों में ही सिमट कर रह जाएगा। दुगड्डा से मात्र दो किमी की दूरी पर शहीद चंद्रशेखर आजाद का स्मृति वृक्ष वैसे तो 12 मई 2006 को ही टूट चुका था।
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शासन-प्रशासन स्तर पर उस वृक्ष के संरक्षण के लिए उचित प्रयास नहीं किए गए। जिससे वह समय-समय पर टूटता गया। पिछले दिनों चली तेज अंधड़ में उसका बचाखुचा हिस्सा भी धराशायी हो गया। यदि समय पर इस वृक्ष का संरक्षण किया होता तो यह सुरक्षित रखा जा सकता था।
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क्या है स्मृति वृक्ष की कहानी
वर्ष 1930 में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों सहित दुगड्डा के नाथूपुर क्षेत्र में भूमिगत रहे थे। आजाद का निशाना अचूक था। काफी दिन यहां रहने के बाद जब वह वापस जा रहे थे तो उनके साथियों ने आजाद को उनका अचूक निशाना दिखाने को कहा।
साथियों के कहने पर आजाद ने अपनी पिस्टल निकाली और काफी दूर एक वृक्ष पर कई राउंड फायर किए। सभी सटीक निशाने पर लगे। आजादी के बाद यह वृक्ष स्मृति वृक्ष के नाम से जाना जाने लगा था।
क्या कहना है अधिकारियों का
वृक्ष के स्थान पर उसी प्रजाति का दूसरा वृक्ष लगाया गया है। जिससे लोगों को उससे प्रेरणा मिलती रहे। स्मृति वृक्ष के अवशेषों को संरक्षित रखने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- सोहन लाल थपलियाल, रेंज अधिकारी दुगड्डा