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केदारघाटीः आपदा से इंसान ही नहीं जानवर भी रो पड़े
सोनप्रयाग/संदीप थपलियाल
Updated Tue, 16 Jul 2013 05:18 PM IST
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उत्तराखंड में प्रकृति के रौद्र रूप ने न केवल इंसानों को तोड़ कर रख दिया बल्कि बेजुबान जानवर भी कराह उठे हैं। जो जानवर स्वतंत्र विचरण करते थे वह तो बच गए लेकिन जिन्हें इंसानों ने अपनी जरूरतों के लिए हमेशा दौड़ाया वही आज केदारघाटी में आपदा के एक माह बीतने के बाद बेहाल नदी के तटों और पहाड़ों में फंसे हुए हैं।
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मानव जाति को रोते तो कई बार देखा लेकिन केदारनाथ त्रासदी में जख्मी हुए एक जानवर को पहली बार आंखों के सामने रोते-बिलखते देखा। सोनप्रयाग में अलकनंदा नदी के दूसरे छोर पर 17 जून से फंसा एक खच्चर नदी में आए पॉलीथिन को खाकर जिंदा बचा हुआ था।
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खच्चर को प्यास लगती तो डर कर मंदाकिनी की धार में मुंह डाल देता और फिर मंदाकिनी के रौद्र रूप को देखकर चुपचाप नदी किनारे लेट जाता। उत्तराखंड में आई आपदा ने किस कदर हालात खराब कर दिए हैं इसकी बानगी क्या इंसान क्या जानवर और क्या प्रकृति हर ओर नजर आ रही है।
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मैं सोमवार सुबह सोनप्रयाग जाने के लिए तैयार होकर गुप्तकाशी बाजार पहुंचा। यहां पीपुल्स फॉर एनीमल और देवगिरी एविएशन हेली कंपनी के लोगों से मुलाकात हुई। वे खच्चर बचाओ मिशन के तहत सोनप्रयाग जा रहे थे।
तब तक मुझे इस बारे में जानकारी नहीं थी कि हम कहां तक जा पाएंगे, लेकिन उनके साथ चले गया। पायलट ने अदम्य साहस का परिचय देकर हेलीकॉप्टर मंदाकिनी नदी के किनारे रेत और पत्थर में उतारा। पीपुल्स फॉर एनीमल संस्था के पंकज पोखरियाल अपने साथ कुछ दवाईयां और गुड़, चना लेकर आए थे।
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उन्होंने जख्मी और भूखे खच्चर को यह खाने के लिए दे दिया। खच्चर आपदा के एक माह बीतने के बांद ठीस से मुंह भी नहीं खोल पा रहा था। खच्चर की हालत देख सभी भावुक हो गए। इतने में पोखरियाल ने कहा कि अब तो खच्चर को लेकर ही सोनप्रयाग से जाऊंगा। मैं जैसे-तैसे मलबे के ढेर में तब्दील हुए सोनप्रयाग बाजार में पहुंचा। यहां एक आश्रम के बाबा से भेंट हुई।
केदारनाथ त्रासदी की खबर सुनकर पैट्रिक नाम का यह बाबा असम से यहां शांति पाठ करने पहुंचा था। बाबा ने कहा कि मैं सात दिन से सोनप्रयाग में हूं। हमेशा मैं यहां खच्चर को देखने पहुंचता हूं कि खच्चर जिंदा है या मर गया। पायलट के अदम्य साहस और पीपुल्स फॉर एनीमल के कार्यकर्ताओं के जुनून से आज एक जानवर को नई जिंदगी मिल गई थी।