{"_id":"623769a900c3816f2b2d35c5","slug":"watchman-for-farming-ranikhet-news-hld4568928149","type":"story","status":"publish","title_hn":"पहरा देकर वन्य जीवों से सब्जियां बचा रहे गगास घाटी के ग्रामीण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पहरा देकर वन्य जीवों से सब्जियां बचा रहे गगास घाटी के ग्रामीण
विज्ञापन
गगास घाटी में लहलहाते सब्जी के खेत। संवाद
- फोटो : RANIKHET
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
रानीखेत (अल्मोड़ा)। बंदरों और अन्य जानवरों के आतंक के कारण पहाड़ में खेती किसानी की हालत ठीक नहीं है। हालांकि मेहनतकश ग्रामीणों के कारण कुछ स्थानों पर अभी भी खेती जिंदा है और जीवनयापन का साधन है। रानीखेत की गगास घाटी सब्जी उत्पादक बेल्ट के रूप में प्रसिद्ध है। इसके पीछे भी ग्रामीणों की अथक मेहनत है। बंदरों और अन्य जानवरों को भगाने के लिए यहां ग्रामीण दोपहर और रात के वक्त पहरा देते हैं।
80 मवास वाले इस गांव में प्रतिदिन 10-10 परिवारों की बारी लगती है। यहां की हरी सब्जियां रानीखेत ही नहीं सोमेश्वर, बागेश्वर आदि क्षेत्रों में भी प्रसिद्ध है। बंदरों और सूअरों के कारण खेती किसानी से विमुख हो रहे ग्रामीणों के लिए गगास घाटी के काश्तकार प्रेरणास्रोत हैं। किसानों ने अपनी मेहनत के बूते बंदरों के आतंक का उपाय खोज डाला। प्रत्येक ग्रामीण बारी बारी से खेतों में पहरा देंगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। गांव में कुल 80 परिवार रहते हैं, जो बारी बारी से दोपहर और रात को पहरा देते हैं। यहां लाही, मूली, मेथी, धनियां, प्याज, आलू, पालक, लहसुन सहित तमाम सब्जियों का उत्पादन होता है।
-गगास घाटी में काश्तकार जंगली जानवरों के आतंक से बचने के लिए पहरा देते हैं। जिस कारण यहां सब्जी उत्पादन चल रहा है। घाटी के प्याज की पौध भी प्रसिद्ध है। जो बागेश्वर, सोमेश्वर से लेकर गढ़वाल तक जाती हैं। ग्रामीण प्याज के बीज भी स्वयं तैयार करते हैं। -राजेंद्र बिष्ट, काश्तकार, गगास घाटी।
विज्ञापन
-पहले हमारे क्षेत्र में जंगली जानवरों का आतंक काफी था, लेकिन खेती बचाने के लिए प्रयास तो करने ही थे, इसीलिए बारी बारी से पहरा देने की प्रक्रिया शुरू की गई, जो आज भी जारी है। यहां तमाम हरी सब्जियों का उत्पादन होता है, जो रानीखेत और अन्य क्षेत्रों में पसंद की जाती है।-रमेश सिंह अधिकारी, काश्तकार, गगास घाटी।
-बंदरों के आतंक के कारण कई स्थानों पर लोग खेती किसानी छोड़ चुके हैं, लेकिन घाटी के लोगों के अथक प्रयासों से हम सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। सभी ग्रामीण बारी बारी से पहरा देते हैं, जिस कारण यहां जंगली सूअर, बंदर आदि नहीं फटकते।
-नंदी रावत, पूर्व बीडीसी मकड़ों, गगास घाटी।
विज्ञापन
80 मवास वाले इस गांव में प्रतिदिन 10-10 परिवारों की बारी लगती है। यहां की हरी सब्जियां रानीखेत ही नहीं सोमेश्वर, बागेश्वर आदि क्षेत्रों में भी प्रसिद्ध है। बंदरों और सूअरों के कारण खेती किसानी से विमुख हो रहे ग्रामीणों के लिए गगास घाटी के काश्तकार प्रेरणास्रोत हैं। किसानों ने अपनी मेहनत के बूते बंदरों के आतंक का उपाय खोज डाला। प्रत्येक ग्रामीण बारी बारी से खेतों में पहरा देंगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। गांव में कुल 80 परिवार रहते हैं, जो बारी बारी से दोपहर और रात को पहरा देते हैं। यहां लाही, मूली, मेथी, धनियां, प्याज, आलू, पालक, लहसुन सहित तमाम सब्जियों का उत्पादन होता है।
विज्ञापन
-गगास घाटी में काश्तकार जंगली जानवरों के आतंक से बचने के लिए पहरा देते हैं। जिस कारण यहां सब्जी उत्पादन चल रहा है। घाटी के प्याज की पौध भी प्रसिद्ध है। जो बागेश्वर, सोमेश्वर से लेकर गढ़वाल तक जाती हैं। ग्रामीण प्याज के बीज भी स्वयं तैयार करते हैं। -राजेंद्र बिष्ट, काश्तकार, गगास घाटी।
विज्ञापन
-पहले हमारे क्षेत्र में जंगली जानवरों का आतंक काफी था, लेकिन खेती बचाने के लिए प्रयास तो करने ही थे, इसीलिए बारी बारी से पहरा देने की प्रक्रिया शुरू की गई, जो आज भी जारी है। यहां तमाम हरी सब्जियों का उत्पादन होता है, जो रानीखेत और अन्य क्षेत्रों में पसंद की जाती है।-रमेश सिंह अधिकारी, काश्तकार, गगास घाटी।
-बंदरों के आतंक के कारण कई स्थानों पर लोग खेती किसानी छोड़ चुके हैं, लेकिन घाटी के लोगों के अथक प्रयासों से हम सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। सभी ग्रामीण बारी बारी से पहरा देते हैं, जिस कारण यहां जंगली सूअर, बंदर आदि नहीं फटकते।
-नंदी रावत, पूर्व बीडीसी मकड़ों, गगास घाटी।