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बिगड़ गए भातखंडे महाविद्यालय के हालात
Updated Sun, 23 Jul 2017 11:16 PM IST
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भातखंडे संगीत महाविद्यालय भवन।
- फोटो : अमर उजाला
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भारतीय शास्त्रीय संगीत विधा को बढ़ावा देने के लिए अल्मोड़ा में स्थापित कुमाऊं मंडल का एकमात्र भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी उपेक्षित है। राज्य बने डेढ़ दशक बीत गया है पर सरकारों और जनप्रतिनिधियों ने महाविद्यालय की दशा सुधारने की ओर ध्यान नहीं दिया। प्राचार्य समेत प्रवक्ताओं के 13 पदों में से मात्र छह में ही नियमित कर्मचारी तैनात हैं।
1989 में अल्मोड़ा में भातखंडे संगीत महाविद्यालय की स्थापना हुई। प्रारंभ में महाविद्यालय धारानौला में जिला पंचायत परिसर में किराए के भवन में संचालित हुआ। शास्त्रीय गायन, सितार, भरतनाट्यम, कथक नृत्य विषय प्रारंभ हुए और छात्र-छात्राओं को शास्त्रीय संगीत की विधाएं सिखाने को शिक्षण शुरू हुआ। संयुक्त उत्तर प्रदेश में महाविद्यालय में प्रवक्ताओं के पद भरे हुए थे। अलग राज्य बनने के बाद पूर्व से महाविद्यालय में तैनात उत्तर प्रदेश संवर्ग के प्रवक्ता अपने मूल प्रदेश वापस चले गए।
उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से महाविद्यालय की स्थिति खराब होते गई। कुछ साल पहले महाविद्यालय नए भवन में स्थानांतरित हो गया। आलीशान भवन तो बना पर पद नहीं भरे गए। महाविद्यालय में 215 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं। प्राचार्य के अलावा प्रवक्ता गायन, कनिष्ठ प्रवक्ता कथक, कनिष्ठ प्रवक्ता भरतनाट्यम, कनिष्ठ प्रवक्ता तबला और संगतकर्ता तबला के पद ही नियमित हैं। संगतकर्ता सारंगी, प्रवक्ता कथक और सितार के पद खाली पड़े हैं। हालांकि कनिष्ठ प्रवक्ता गायन, सितार के अलावा संगतकर्ता के दो पदों पर आउट सोर्सिंग से कार्मिक तैनात हैं। नियमित कार्मिकों की तैनाती नहीं होने से विद्यार्थियों के प्रशिक्षण पर असर पड़ना स्वाभाविक है। संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे करने वाली राज्य में सत्तारूढ़ रही सरकारों और जनप्रतिनिधियों ने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जिसका खामियाजा छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ता है।
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रिक्त पदों की सूचना समय-समय पर शासन को भेजी जाती है। खाली पदों पर नियुक्ति का मामला शासन स्तर का है।
योगेश पंत, प्राचार्य, भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय अल्मोड़ा।
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1989 में अल्मोड़ा में भातखंडे संगीत महाविद्यालय की स्थापना हुई। प्रारंभ में महाविद्यालय धारानौला में जिला पंचायत परिसर में किराए के भवन में संचालित हुआ। शास्त्रीय गायन, सितार, भरतनाट्यम, कथक नृत्य विषय प्रारंभ हुए और छात्र-छात्राओं को शास्त्रीय संगीत की विधाएं सिखाने को शिक्षण शुरू हुआ। संयुक्त उत्तर प्रदेश में महाविद्यालय में प्रवक्ताओं के पद भरे हुए थे। अलग राज्य बनने के बाद पूर्व से महाविद्यालय में तैनात उत्तर प्रदेश संवर्ग के प्रवक्ता अपने मूल प्रदेश वापस चले गए।
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उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से महाविद्यालय की स्थिति खराब होते गई। कुछ साल पहले महाविद्यालय नए भवन में स्थानांतरित हो गया। आलीशान भवन तो बना पर पद नहीं भरे गए। महाविद्यालय में 215 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं। प्राचार्य के अलावा प्रवक्ता गायन, कनिष्ठ प्रवक्ता कथक, कनिष्ठ प्रवक्ता भरतनाट्यम, कनिष्ठ प्रवक्ता तबला और संगतकर्ता तबला के पद ही नियमित हैं। संगतकर्ता सारंगी, प्रवक्ता कथक और सितार के पद खाली पड़े हैं। हालांकि कनिष्ठ प्रवक्ता गायन, सितार के अलावा संगतकर्ता के दो पदों पर आउट सोर्सिंग से कार्मिक तैनात हैं। नियमित कार्मिकों की तैनाती नहीं होने से विद्यार्थियों के प्रशिक्षण पर असर पड़ना स्वाभाविक है। संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे करने वाली राज्य में सत्तारूढ़ रही सरकारों और जनप्रतिनिधियों ने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जिसका खामियाजा छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ता है।
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रिक्त पदों की सूचना समय-समय पर शासन को भेजी जाती है। खाली पदों पर नियुक्ति का मामला शासन स्तर का है।
योगेश पंत, प्राचार्य, भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय अल्मोड़ा।