फ्लैश बैक: 1989 के लोस चुनाव में अवैध मतों ने बिगाड़ दिया था गणित, मतगणना को लेकर हुआ था हंगामा
1989 में हुए चुनाव में अल्मोड़ा संसदीय सीट पर अवैध मतों ने प्रत्याशियों का चुनावी गणित बनाने और बिगाड़ने का काम किया। इस चुनाव में 35 हजार मतपत्र अवैध घोषित हुए। नतीजतन पूरा चुनावी गणित बदल गया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
1989 के लोकसभा चुनाव में अल्मोड़ा संसदीय सीट पर कांग्रेस ने लगातार दो बार के सांसद हरीश रावत को मैदान में उतारा। तब पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग जोरों पर थी। इस मुहिम को 1985 में सीमांत विधानसभा क्षेत्र डीडीहाट का प्रतिनिधित्व कर चुके नई क्षेत्रीय पार्टी के युवा नेता काशी सिंह ऐरी धार दे रहे थे। तब ऐरी को यूकेडी ने लोकसभा चुनाव मैदान में उतारा था।
यूकेडी और पार्टी के युवा नेता ऐरी को खासा जनसमर्थन मिल रहा था। गढ़वाल की सीमा से लेकर चीन और नेपाल सीमा तक लोगों की जुबान पर ऐरी का नाम था और सबको लग रहा था कि इस बार वह मैदान मार ले जाएंगे। चुनाव के बाद मतगणना हुई और 35000 मत पत्र अवैध घोषित हो गए। नतीजतन हरीश रावत को विजश्री मिली। काशी सिंह ऐरी को 10701 वोट से हार का सामना करना पड़ा और यूकेडी के चुनाव चिह्न बाघ की दहाड़ शांत हो गई। इस चुनाव में हार का सामना करने के बाद भी ऐरी पहाड़ के बड़े नेता के रूप में उभरकर सामने आए।
1989 के लोकसभा चुनाव में अवैध मत पत्रों को लेकर हंगामा हुआ। निर्वाचन आयोग ने इसका कारण मतपत्रों पर स्याही फैलना बताया। अंत में हरीश रावत को 1,49,703 और काशी सिंह ऐरी को 1,38,902 मत मिले। इस चुनाव के बाद अलग राज्य निर्माण के लिए आंदोलन शुरू हुआ, इसमें यूकेडी और काशी सिंह ऐरी की सक्रिय भूमिका रही।
ठंडू से ठंडू मेरा पहाड़ा की हवा ठंडी, पाणी रे ठंडू’ जैसे गीतों से बनी सोच ने गांव में रुकने के उनके फैसले को नहीं बदला और इस प्रकार वे ‘मुझे पहाड़ी पहाड़ी मत बोलो’ का राग ही अलापते रह गए। जब हालत यह हों कि राज्य के विधायक प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण में शीतसत्र भी नहीं कराना चाहते हैं, तो इससे दिख जाता है कि पहाड़ी इलाकों में सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या स्तर होगा। पहाड़ से निकले लोगों का पहाड़ों में घर वापसी यानी रिवर्स माइग्रेशन का सफर अभी बहुत दूर की कौड़ी है। सभी दलों को इसके लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। -देवेंद्र कुमार बुड़ोकोटी, समाजसेवी