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गांवों के दर्द को कलाकृति में उकेरा
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा।
Updated Wed, 31 Jan 2018 10:43 PM IST
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धीरेंद्र कुमार पांडे चीड़ के बगेट (छाल) से बनाई गई कलाकृति के साथ
- फोटो : अमर उजाला
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नगर के त्यूनरा निवासी धीरेंद्र कुमार पांडे चीड़ के बगेट (छाल) से सुंदर कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। उन्होंने पलायन शीर्षक से नई कलाकृति बनाई हैं। जिसमें पलायन से वीरान हो रहे गांवों की बदहाली को बड़ी मार्मिकता से उजागर किया गया है।
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कलाकृति में गांवों में रहने वाले निशक्त वृद्ध माता-पिता और दिव्यांग जन अपनों की गांव लौटने की आस में राह तकते हुए दिखाए गए हैं।
धीरेंद्र कुमार पांडे का कहना है कि आज पलायन एक बहुत बड़ी त्रासदी बन गई है। रोजगार और बच्चों के बेहतर भविष्य की तलाश में गांवों से तेजी से पलायन हो रहा है। जिन गांवों में कभी झोड़ा, चांचरी, भगनौल, हुड़किया बौल से खुशनुमा माहौल बना रहता था, आज वहां वीरानी छाई हुई है।
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उन्होंने कहा कि रोजगार की तलाश में निकले लोग गांव नहीं लौटना चाह रहे हैं। यदि गांवों में ही लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो कुछ हद तक इसमें कमी आ सकती है। गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा व्यवस्था की हालत काफी खराब है।
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इस कारण भी गांवों से तेजी से पलायन बढ़ा है। वह अब तक चीड़ के बगेट से लार्ड बुद्धा, मां नंदा-सुनंदा, भगवान गणेश, देवालयों को संरक्षित करें, काटे गए वृक्षों का दर्द आदि विषयों पर सुंदर कलाकृति बना चुके हैं।
पांडे ने बताया कि एक कलाकृति को बनाने में तीन से चार दिन तक लग जाते हैं। बगेट से कलाकृति बनाना कम खर्चीला है। इसके बावजूद लोगों का रुझान इस ओर कम है। वह अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी आर्ट गैलरी में लगाना चाहते हैं।