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भाषा विलुप्त होने से उससे जुड़ा इतिहास भी नहीं बचता : प्रो.जोशी
अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Fri, 12 Oct 2018 12:00 AM IST
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संकटग्रस्त भाषाओं की स्थिति पर आयोजित सेमिनार में मौजूद प्रतिभागी।
- फोटो : अमर उजाला
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दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र और बीपी कोइराला इंडो-नेपाल फाउंडेशन की ओर से एसएसजे परिसर के दृश्य कला संकाय सभागार में आयोजित तीन दिवसीय गोष्ठी में वक्ताओं ने पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की संकटग्रस्त लोक भाषाओं की स्थिति पर विचार-विमर्श किया। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के निदेशक और कुमाऊं विवि के पूर्व कुलपति प्रो.बीके जोशी ने कहा कि भाषा के समाप्त होने का असर सिर्फ अभिव्यक्ति पर ही नहीं बल्कि इसका संस्कृति, रहन-सहन और जीवन शैली पर भी असर पड़ता है।
प्रो. जोशी ने कहा कि भाषा के विलुप्त होने से उससे जुड़ा इतिहास भी समाप्त हो जाता है। लखनऊ विवि के भाषा विभाग की प्रो. कविता रस्तोगी ने संकटग्रस्त राजी जनजाति की बोली और उनके सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तनों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिंदी और कुमाऊंनी के प्रभाव के कारण राजी जनजाति की बोली प्रभावित हो रही है। पोलैंड से आए प्रो. क्रिस्टाफ ने कहा कि हिमालयी भाषाओं में केवल तीन-चार भाषाएं ऐसी मिलती हैं जिनके पुराने ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी, गढ़वाली, नेपाली आदि भाषाओं के डिजिटल संग्रह पर भी काम चल रहा है।
आयोजन से जुड़े प्रो.एमपी जोशी ने बताया कि गोष्ठी में 25 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इस मौके पर त्रिभुवन विवि नेपाल के चूरामणि बंधु, रसियन एकेडमी की अनास्टॉसिकिया क्रिस्लोया, जुलिया एबगेनिया, कुमाऊं विवि के प्रो.देव सिंह पोखरिया, प्रो.दिवा भट्ट, डा. ललित जोशी, शिप्रा पंत, मनीषा पांडे के अलावा नार्वे, रूस, पोलेंड सहित देश के विभिन्न इलाकों के कई भाषाविद् और अन्य लोग मौजूद थे।
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प्रो. जोशी ने कहा कि भाषा के विलुप्त होने से उससे जुड़ा इतिहास भी समाप्त हो जाता है। लखनऊ विवि के भाषा विभाग की प्रो. कविता रस्तोगी ने संकटग्रस्त राजी जनजाति की बोली और उनके सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तनों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिंदी और कुमाऊंनी के प्रभाव के कारण राजी जनजाति की बोली प्रभावित हो रही है। पोलैंड से आए प्रो. क्रिस्टाफ ने कहा कि हिमालयी भाषाओं में केवल तीन-चार भाषाएं ऐसी मिलती हैं जिनके पुराने ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी, गढ़वाली, नेपाली आदि भाषाओं के डिजिटल संग्रह पर भी काम चल रहा है।
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आयोजन से जुड़े प्रो.एमपी जोशी ने बताया कि गोष्ठी में 25 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इस मौके पर त्रिभुवन विवि नेपाल के चूरामणि बंधु, रसियन एकेडमी की अनास्टॉसिकिया क्रिस्लोया, जुलिया एबगेनिया, कुमाऊं विवि के प्रो.देव सिंह पोखरिया, प्रो.दिवा भट्ट, डा. ललित जोशी, शिप्रा पंत, मनीषा पांडे के अलावा नार्वे, रूस, पोलेंड सहित देश के विभिन्न इलाकों के कई भाषाविद् और अन्य लोग मौजूद थे।
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