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19वीं सदी में अल्मोड़ा से हुआ बैठकी होली का श्रीगणेश
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Tue, 28 Feb 2017 10:26 PM IST
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कुमाऊं में होली गायन की विधा का लंबा इतिहास माना जाता है। बताया जाता है कि चंद राजाओं के शासनकाल में भी बैठकी होली की गूंज सुनाई देती थी। धमार गीत की यह पंक्ति तुम राजा महाराज प्रद्युम्रशाह, मेरी करो प्रतिपाल, लाल होली खेल रहे हैं... इस बात के प्रमाण देती है कि होली गायन की यह विधा तब के राजाओं को भी काफी पसंद आती रही थी।
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उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बैठकी होली गायन की परंपरा का श्रीगणेश अल्मोड़ा से ही माना जाता है। होली गायन की यह धरोहर आज से करीब 300 वर्ष पूर्व कुमाऊं में अपना स्थान बना चुकी थी। तब इसका गायन राज दरबारों तक ही सीमित था, लेकिन समय के साथ इस विद्या ने आम जनमानस को भी जोड़ लिया। कुमाऊं के प्रख्यात होली गायक शिवचरण पांडे बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में बैठकी होली का श्रीगणेश अल्मोड़ा के मल्ली बाजार स्थित हनुमान मंदिर से हुआ। उस दौर में स्व. गांगीराम वर्मा, स्व. शिवलाल वर्मा, स्व. मोहन लाल साह और चंद्र सिंह नयाल आदि ने होली बैठकों का आयोजन किया।
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उस समय ठुमरी, टप्पा और गजल गायकी में सिद्धहस्त रहीं गणिका राम प्यारी को आदर भाव से होली गायन के लिए बुलाया जाता था। उसके बाद प्रख्यात होली गायक स्व. तारा प्रसाद पांडे ने बैठकी होली को नया आयाम दिया। रंगकर्मी शिवचरण पांडे बताते हैं कि अल्मोड़ा में उन दिनों ब्रज की रास मंडलियां और नौटंकी दलों की भी खूब धूम रहा करती थी।
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