{"_id":"5d938dfe8ebc3e017a2114db","slug":"regional-gandhi-ashram-chanodas-existence-in-danger-almora-news-hld3588702117","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्षेत्रीय गांधी आश्रम चनौदा का अस्तित्व खतरे में","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
क्षेत्रीय गांधी आश्रम चनौदा का अस्तित्व खतरे में
विज्ञापन
गांधी आश्रम चनौदा का भवन।
- फोटो : ALMORA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। देश की विरासत चनौदा में बापू की प्रेरणा से स्थापित उत्तराखंड के पहले क्षेत्रीय गांधी आश्रम का अस्तित्व खतरे में है। आश्रम का भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में है। कई मशीनें टिनशेड में चल रही हैं। गांधी आश्रम 4.25 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहा है, लेकिन घाटे से उबारने के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1929 में कुमाऊं के भ्रमण के दौरान अल्मोड़ा होते हुए कौसानी जाने के दौरान कुछ देर चनौदा में रुके। साथ उनके सहयोगी प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति लाल त्रिवेदी भी थे। गांधीजी ने इस स्थान पर एकत्र हुए लोगों से विदेशी कपड़े त्यागकर स्वयं के बनाए कपड़े पहनने का आह्वान किया था। महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही शांति लाल त्रिवेदी ने 1937 में यहां आकर गांधी आश्रम की स्थापना की। इसके लिए ग्रामीणों ने 30 नाली भूमि दान में भी दी।
शुरू में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग खादी के वस्त्र तैयार कर पूरे क्षेत्र में बांटते थे। इससे स्वरोजगार भी मिलता था। प्रारंभ में यहां कुछ चर्खे लगाए गए। धीरे-धीरे मशीनों स्थापित की गईं। वर्तमान में यहां 85 कर्मचारी कार्यरत हैं। 250 बुनकर काम करते हैं। पिछले बीस साल से यह संस्था घाटे में चल रही है।
विज्ञापन
गांधी आश्रम से उत्पादित सामग्री से विक्रय के बाद 50 लाख रुपये छूट का पैसा वर्तमान में सरकार के पास है, लेकिन यह धनराशि गांधी आश्रम को अवमुक्त नहीं की जा रही है।
विज्ञापन
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 1929 में कुमाऊं के भ्रमण के दौरान अल्मोड़ा होते हुए कौसानी जाने के दौरान कुछ देर चनौदा में रुके। साथ उनके सहयोगी प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति लाल त्रिवेदी भी थे। गांधीजी ने इस स्थान पर एकत्र हुए लोगों से विदेशी कपड़े त्यागकर स्वयं के बनाए कपड़े पहनने का आह्वान किया था। महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही शांति लाल त्रिवेदी ने 1937 में यहां आकर गांधी आश्रम की स्थापना की। इसके लिए ग्रामीणों ने 30 नाली भूमि दान में भी दी।
विज्ञापन
शुरू में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग खादी के वस्त्र तैयार कर पूरे क्षेत्र में बांटते थे। इससे स्वरोजगार भी मिलता था। प्रारंभ में यहां कुछ चर्खे लगाए गए। धीरे-धीरे मशीनों स्थापित की गईं। वर्तमान में यहां 85 कर्मचारी कार्यरत हैं। 250 बुनकर काम करते हैं। पिछले बीस साल से यह संस्था घाटे में चल रही है।
विज्ञापन
गांधी आश्रम से उत्पादित सामग्री से विक्रय के बाद 50 लाख रुपये छूट का पैसा वर्तमान में सरकार के पास है, लेकिन यह धनराशि गांधी आश्रम को अवमुक्त नहीं की जा रही है।