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जिस दल के विधायक को जनादेश मिलता है, प्रदेश में सरकार उस दल की नहीं होती
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
Updated Sun, 05 Feb 2017 11:40 PM IST
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पिलखोली रानीखेत
- फोटो : अमर उजाला
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। रानीखेत विधानसभा सीट एक ऐसी सीट रही है, जहां जिस दल के विधायक को जनादेश मिलता है, प्रदेश में सरकार उस दल की नहीं होती है। राज्य बनने के बाद हुए पहले आम चुनाव से यह सिलसिला लगातार चल रहा है। नागरिक भी लगातार यही कहते हैं कि सत्ताधारी दल का ही विधायक होना चाहिए, इससे क्षेत्र का विकास होगा, इस बार यह मिथक टूट गया नहीं, यह तो 11 मार्च को ही पता चल सकेगा, अलबत्ता इस सीट पर कांग्रेस, भाजपा का ही परचम लहराता रहा है।
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उत्तराखंड विधानसभा के लिए पहला आम चुनाव 2002 में हुआ था, इस चुनाव में भाजपा की तरफ से वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, कांग्रेस से स्व. पूरन सिंह माहरा, उक्रांद से नरेंद्र रौतेला मैदान में थे, लेकिन बाजी लेकिन बाजी अजय भट्ट ने मारी, भट्ट को 10199, कांग्रेस के पूरन माहरा को 7897, नरेंद्र रौतेला को 3900 मत मिले थे, इस बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई।
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2007 में हुए दूसरे आम चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर अजय भट्ट पर दांव खेला, कांग्रेस ने स्व. माहरा के भाई ताड़ीखेत के तत्कालीन ब्लॉक प्रमुख करन माहरा को टिकट थमाया, जबकि बसपा से स्व. पूरन सिंह डंगवाल ने चुनाव लड़ा। इस चुनाव में बाजी कांग्रेस के करन माहरा ने मारी। जीत का अंतर मात्र 205 रहा। माहरा को 13503, अजय भट्ट को 13298, बसपा के पूरन सिंह को 3500 से अधिक मत मिले।
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तब प्रदेश में सरकार भाजपा की बनी। 2012में हुए तीसरे आम चुनाव में भाजपा ने अजय भट्ट, कांग्रेस ने सिटिंग विधायक करन माहरा, बसपा ने पूरन सिंह डंगवाल पर दांव खेला। पहली बार विधानसभा में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला। बाजी भाजपा के अजय भट्ट के नाम रही। भट्ट को 14089, करन माहरा को 14011, स्व. डंगवाल को 9297 मत मिले, लेकिन इस बार भी मिथक नहीं टूटा, प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बन गई। इस बार यह मिथक टूटेगा या नहीं, यह 11 मार्च को पता चलेगा।