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Parasitic Wasp: हिमालय के जंगलों में मिली परजीवी ततैया की नई प्रजाति, अब तक नहीं था इसका वैज्ञानिक रिकॉर्ड

Mon, 08 Jun 2026 02:17 PM IST
गायत्री जोशी संजय नयाल
संजय नयाल Published by: गायत्री जोशी Updated Mon, 08 Jun 2026 02:17 PM IST
सार

चंपावत जिले के फोर्ती गांव में एसएसजे विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने परजीवी ततैया की एक नई प्रजाति खोजी है। इसका कोई वैज्ञानिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं था। इस खोज को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। 

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new parasitic wasp species discovered in himalayan forests of champawat
परजीवी ततैया की नई प्रजाति। - फोटो : संवाद

विस्तार

चंपावत जिले के एक छोटे से हिमालयी गांव के आसपास किए गए शोध ने दुनियाभर के वैज्ञानिक जगत का ध्यान आकर्षित किया है। फोर्ती गांव में परजीवी ततैया की एक ऐसी प्रजाति मिली है जिसका अब तक कोई वैज्ञानिक रिकॉर्ड नहीं था। इस नई प्रजाति का नाम नियानास्टेटस इंडिगोफेरम रखा गया है।

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सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के शोधार्थियों ने चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र स्थित फोर्ती गांव में हिमालयी वनस्पतियों का अध्ययन किया। इस शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल इंसेक्ट साइंस ने मान्यता देते हुए प्रकाशित किया है। शोध के दौरान औषधीय पौधे इंडिगोफेरा हेटेरैंथा पर बनने वाली गांठों (गॉल) की जांच की गई।

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अध्ययन में पता चला कि इन गांठों में रहने वाले सूक्ष्म गॉल मिज कीटों पर एक छोटी परजीवी ततैया आश्रित है। वर्गिकी और सूक्ष्म संरचनात्मक विश्लेषण के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह विज्ञान के लिए पूरी तरह नई प्रजाति है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रजाति चैल्सिडोइडिया समूह की परजीवी ततैयों से संबंधित है। ये प्राकृतिक रूप से हानिकारक कीटों की संख्या नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यह प्रजाति नियानास्टेटस कुल से संबंध रखती है। अब तक विश्वभर में इस कुल की केवल 47 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। यह खोज हिमालयी जैव विविधता के छिपे रहस्यों को उजागर करती है। साथ ही भविष्य में पर्यावरण अनुकूल जैविक कीट नियंत्रण की दिशा में भी नई संभावनाएं खोलती है।

जैव विविधता प्रबंधन में नई उम्मीद

शोधार्थियों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में अभी भी अनेक सूक्ष्म जीव और कीट प्रजातियां मौजूद हैं जिनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। यह शोध उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण होने के साथ-साथ कृषि, वन संरक्षण और जैव विविधता प्रबंधन के क्षेत्र में भी नई उम्मीदें जगाता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसी परजीवी प्रजातियां भविष्य में जैविक कीट नियंत्रण के प्रभावी साधन बन सकती है जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।

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जटिल पारिस्थितिक संबंधों की पहचान

शोध दल ने प्रयोगशाला में गॉल का पालन-पोषण कर ततैया की संरचना, जीवनचक्र और अन्य प्रजातियों से उसकी भिन्नताओं का विस्तृत अध्ययन किया। शोध में औषधीय पौधों, कीटों और परजीवी जीवों के बीच मौजूद जटिल पारिस्थितिक संबंधों की भी पहचान की गई। अध्ययन में यह भी सामने आया कि इंडिगोफेरा हेटेरैंथा पौधा, उस पर गांठ बनाने वाला गॉल मिज कीट और उस कीट पर निर्भर यह परजीवी ततैया एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
 

ततैया की नई प्रजाति की खोज उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता का वैज्ञानिक प्रमाण है। परजीवी ततैया की यह प्रजाति हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं। वर्तमान में कई विकसित देशों में परजीवी कीटों का प्रयोग हानिकारक कीट को नियंत्रण करने में उपयोग किया जा रहा है। - डॉ. संदीप कुमार, मुख्य अन्वेषक, जंतु विज्ञान विभाग, एसएसजे विवि अल्मोड़ा

हिमालय की जैव विविधता में अभी भी कई प्रकार के अनजाने जीव छिपे हुए हैं। यह शोध भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल कीट नियंत्रण की नई संभावनाओं को मजबूत करेगा। - सुमन उपाध्याय, शोधार्थी, जंतु विज्ञान विभाग, एसएसजे विवि अल्मोड़ा

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