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देश से छावनी एक्ट हटना जरूरी : भंडारी

Sun, 28 Apr 2019 11:01 PM IST
almora Published by: दीपक नेगी Updated Sun, 28 Apr 2019 11:01 PM IST
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Must be removed from the country's cantonment act: Bhandari
सेवानिवृत्त ले. जनरल मोदन चंद्र भंडारी। - फोटो : amar ujala

 रक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भंडारी का कहना है कि छावनी एक्ट लगभग पूरे विश्व में समाप्त हो चुका है, लेकिन रानीखेत सहित देश की 62 छावनियों में आजादी के 72 साल बाद भी लोग इस कानून के कारण अपने मौलिक और संपत्ति के अधिकारों से वंचित हैं। कहा कि यह एक्ट भारत के अलावा, पाकिस्तान, वर्मा, श्रीलंका, नेपाल में लागू है, जिसे यथाशीघ्र हटाने की जरूरत है।

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अमर उजाला से फोन पर हुई विशेष बातचीत में जनरल भंडारी ने बताया कि देश की 62 छावनियों के संरक्षक होने के नाते वह इनमें रहने वाले करीब 35 लाख लोगों के मौलिक अधिकारों को लेकर काफी चिंतित हैं। कहा कि संसदीय लोकतंत्र में हर किसी को अपने हिसाब से जीवन यापन का अधिकार है, लेकिन छावनियों के अनावश्यक दखल से इनमें रहने वाले लोग परेशान हैं। इसी के चलते वे सिविल एरिया को छावनियों से हटाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कहा कि उन्हीं के प्रयासों से हाईकोर्ट ने रानीखेत छावनी परिषद द्वारा लोगों के लिए भेजे गए करोड़ों के नोटिसों पर स्टे लिया है।
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कहा कि सबसे ताज्जुब की बात तो यह है कि सेना भी कह चुकी है कि मीलिट्री एरिया वाले भाग को छोड़कर बाकी एरिया को छावनी से हटाने में कोई दिक्कत नहीं है, यही नहीं इस बारे 1954 में ससंद में भी प्रस्ताव पारित हुआ था जिसमें अंग्रेजी शासकों द्वारा बनाए गए नियमों के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इसे समाप्त करने की बात कही गई थी, लेकिन अफसोस है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 
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कमेटी ने भी की है एक्ट समाप्त करने की सिफारिश
सेवानिवृत्त ले.जनरल एमसी भंडारी का कहना है कि देश के 62 छावनियों की अगुवाई करने वाले ऑल कैंट सिटीजन वेलफेयर ऐसोसिएशन के प्रयासों से रक्षा मंत्रालय द्वारा अमित बोस की अध्यक्षता में कमेटी गठित की है।


कमेटी द्वारा भी छावनी एक्ट को समाप्त करने की सिफारिश की गई है। बताया कि 1836 में अंग्रेजों द्वारा बनाया कानून आज भी चल रहा है 1924 में छावनी एक्ट में कुछ संशोधन हुआ था, लेकिन 2006 में इसे और भी खतरनाक बना दिया गया। बताया कि संविधान की धारा 73 और 74 में स्पष्ट उल्लेख है कि नागरिक पंचायत के अधीन रहेंगे, लेकिन कैंट एक्ट में इसकी भी खिल्ली उड़ाई जा रही है ।

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