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अंग्रेजों की भी आस्था का केंद्र रही हैं मां झूला देवी
नवीन भट्ट अमर उजाला ब्यूरो रानीखेत
Updated Sat, 01 Apr 2017 10:47 PM IST
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झूला देवी
- फोटो : अमर उजाला
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प्रख्यात झूला देवी मंदिर में क्षेत्र के लोगों की अपार श्रद्धा है। प्रतिदिन श्रद्धालु यहां आकर शीश नवाते हैं, नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर निर्माण के पीछे कई मान्यताएं हैं। बताते हैं कि ब्रिटिशकाल में अंग्रेज हुक्मरानों की भी माता में बेहद आस्था थी। दीप पर्व पर अंग्रेज यहां दीपदान के लिए तेल आदि की व्यवस्थाएं करते थे।
मान्यता है कि 700 साल पहले पिल्खोली क्षेत्र में जंगली जानवरों का आतंक था। तेंदुआ प्रतिदिन मवेशियों को शिकार बना देता था। भयभीत ग्रामीणों ने देवी की भक्ति की। माता ने पिलखोली के एक ग्रामीण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि जिस स्थान पर मवेशी विचरण करते हैं, उस स्थान पर जमीन में अद्भुत नक्कासी वाली मूर्ति दबी पड़ी है। मूर्ति को बाहर निकालकर वहां मंदिर निर्माण कराओ तो शांति मिलेगी। सपने के अनुसार ग्रामीणों ने खुदाई कर मूर्ति निकाली और वहां छोटा से मंदिर बनाया। माता का नाम झूलादेवी पड़ने के पीछे भी मान्यता यह है कि मवेशी चराने आने वाले ग्वाले बांझ के पेड़ में रस्सी डालकर झूला झूलते थे। बताते हैं कि माता को झूला पसंद आ गया, उन्होंने फिर से ग्रामीणों को सपने में दर्शन दिए और उन्हें झूले में विराजमान करने को कहा। इसी कारण इस सर्व सिद्धि दायिनी देवी का नाम झूला देवी पड़ गया। आज भी माता की मूर्ति झूले में रखी गई है। बुजुर्ग बताते हैं कि ब्रिटिशकाल के दौरान अंग्रेजों की भी श्रद्धा मंदिर में काफी थी, वह लोग भी माता की भक्ति के लिए पहुंचते थे, दीप पर्व सहित तमाम त्योहारों में वह तेल दान किया करते थे। वर्तमान में सेना के लोग भी माता को सिद्दत से पूजते हैं।
फोटो: 01 आरकेटी 06पी: झूले पर विराजमान मां झूला देवी।
मान्यता है कि 700 साल पहले पिल्खोली क्षेत्र में जंगली जानवरों का आतंक था। तेंदुआ प्रतिदिन मवेशियों को शिकार बना देता था। भयभीत ग्रामीणों ने देवी की भक्ति की। माता ने पिलखोली के एक ग्रामीण को सपने में दर्शन दिए और बताया कि जिस स्थान पर मवेशी विचरण करते हैं, उस स्थान पर जमीन में अद्भुत नक्कासी वाली मूर्ति दबी पड़ी है। मूर्ति को बाहर निकालकर वहां मंदिर निर्माण कराओ तो शांति मिलेगी। सपने के अनुसार ग्रामीणों ने खुदाई कर मूर्ति निकाली और वहां छोटा से मंदिर बनाया। माता का नाम झूलादेवी पड़ने के पीछे भी मान्यता यह है कि मवेशी चराने आने वाले ग्वाले बांझ के पेड़ में रस्सी डालकर झूला झूलते थे। बताते हैं कि माता को झूला पसंद आ गया, उन्होंने फिर से ग्रामीणों को सपने में दर्शन दिए और उन्हें झूले में विराजमान करने को कहा। इसी कारण इस सर्व सिद्धि दायिनी देवी का नाम झूला देवी पड़ गया। आज भी माता की मूर्ति झूले में रखी गई है। बुजुर्ग बताते हैं कि ब्रिटिशकाल के दौरान अंग्रेजों की भी श्रद्धा मंदिर में काफी थी, वह लोग भी माता की भक्ति के लिए पहुंचते थे, दीप पर्व सहित तमाम त्योहारों में वह तेल दान किया करते थे। वर्तमान में सेना के लोग भी माता को सिद्दत से पूजते हैं।
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फोटो: 01 आरकेटी 06पी: झूले पर विराजमान मां झूला देवी।