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प्रचार में अब लोक गीत और हुड़के की थाप गायब
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Mon, 16 Jan 2017 10:45 PM IST
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लोकतंत्र के पहले आम चुनाव घोषित हुए तो कार्यकर्ता प्रचार के लिए लोक गीतों को माध्यम बनाते थे, झुंड में चलकर हुड़कों की थाप के बीच घर-घर जाकर वोट मांगते थे। 1969 में रानीखेत सीट से जब कांग्रेस प्रत्याशी यूपी के सीएम चंद्र भानु गुप्ता और निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व मंत्री स्व. गोविंद सिंह माहरा के बीच सीधी टक्कर हुई तो ‘लसका कमर बांधा, हिम्मत का साथा’ लोकगीत खूब प्रचलित हुआ, हालांकि इस चुनाव में स्व. माहरा को शिकस्त मिली थी। वर्तमान में लोकगीतों की जगह फेसबुक, वाट्सएप, एसएमएस ने ले ली है।
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चुनावों में प्रचार के लिए राजनीतिक दल लोकगीतों को सटीक तरीका मानते थे। कहा जाता था कि गीतों के माध्यम से जहां आम ग्रामीणों में प्रत्याशी की सीधी तस्वीर जाती है, वहीं प्रत्याशी का भी हौसला बढ़ता है। वरिष्ठ व्यापारी कैलाश पांडे बताते हैं कि 1970 के दशक में हीरा सिंह राणा, शेरदा अनपढ़ बाद के वर्षों में सल्ट की कमला मौलेखी आदि ने चुनावी गीत तैयार किए। हीरा सिंह राणा द्वारा तैयार लसका कमर बांधा, हिम्मत का साथा, भोल तो उज्याउ होलो, कब ले रोली राता गीत खासा लोकप्रिय हुआ। तकनीक के विस्तार के साथ ही चुनाव का तरीका ही बदल गया है। अब फेसबुक, वाट्सएप, मोबाइल मैसेज के माध्यम से प्रचार हो रहा है। प्रशासन के लिए भी यह प्रचार का तरीका चुनौती बन रहा है।
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