{"_id":"5f4a8b048ebc3e414325718e","slug":"medicinal-plants-of-himalayas-almora-news-hld395067969","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोरोना मेंमहत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं हिमालयी औषधीय पादप: प्रो. जोशी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कोरोना मेंमहत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं हिमालयी औषधीय पादप: प्रो. जोशी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अल्मोड़ा। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल, प्रो. वाईपीएस पांगती शोध प्रतिष्ठान नैनीताल और वनस्पति विज्ञान विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय की ओर से कोविड-19 परिदृश्य में हिमालयी औषधीय पादपों की आजीविका संवर्धन में भूमिका विषय पर हुए वेबिनार में वक्ताओं ने कहा कि हिमालयी औषधीय पादपों की खेती आजीविका में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वेबिनार में देश के कई हिस्सों से 10 औषधीय पादप विशेषज्ञ और 300 से ज्यादा प्रतिभागी शामिल हुए।
मुख्य अतिथि कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के कुलपति प्रो. एनके जोशी ने कहा कि कोविड-19 की वैश्विक आपदा में हिमालयी औषधीय पादपों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। उन्होंने औषधीय पादप संपदा को संरक्षित करके हिमालयी क्षेत्र में रह रहें लोगों के लिए इन्हें जीविका के साधन के रूप में बढ़ावा देने की बात कही। हिमालयी क्षेत्रों में पाई जानी वाली विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से प्रवासी लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सकता है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आरएस रावल ने कहा कि हिमालयी औषधीय पादपों की खेती को बढ़ावा देकर कोरोना के समय में उत्पन्न बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है। पहले सत्र में सेवानिवृत्त पीसीसीएफ हिमाचल प्रदेश डॉ. जीएस गोराया और एचएफआरआई शिमला के निदेशक डॉ. एसएस सामंत ने जड़ी-बूटियों का महत्व बताते हुए उनके आकलन की जानकारी दी।
दूसरे सत्र में सीएसआईआरआई एचबीटी पालमपुर के निदेशक डॉ. संजय कुमार, जड़ी-बूटी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. सीएस सनवाल, ईएमआरसी के एक्जीक्यूटिव निदेशक डॉ. केएस रावत ने विचार रखे। तीसरे सत्र में एनएमपीबी नई दिल्ली के सीईओ डॉ. जेएलएन शास्त्री, प्रो. वाईपीएस परमार रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. बीएस कालाकोटी, सीएपी देहरादून की निदेशक डॉ. हेमा लोहनी ने उद्योगों और बाजार में औषधि की प्रचुर मात्रा में जरूरत का विश्लेषण किया।
विज्ञापन
अंतिम सत्र में एनआरआई सूवा रिसपा लेह के निदेशक डॉ. पदम गुरमेट, सीएसआईआर जम्मू के वैज्ञानिक डॉ. सुमित गैरोला, एचएपीपीआरसी श्रीनगर गढ़वाल के प्रो. एमसी नौटियाल ने पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक शोध के समन्वय से औषधीय पादपों के कृषिकरण को बढ़ावा देने पर चर्चा की। इससे पूर्व प्रो. वाईपीएस पांगती शोध प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. बीएस कालाकोटी ने सभी का स्वागत किया। भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून के पूर्व निदेशक डॉ. जीएस रावत ने कार्यक्रम की अगुवाई की। पर्यावरण संस्थान के डॉ. आईडी भट्ट और कुमाऊं विवि के प्रो. ललित तिवारी ने आभार जताया।
विज्ञापन
मुख्य अतिथि कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के कुलपति प्रो. एनके जोशी ने कहा कि कोविड-19 की वैश्विक आपदा में हिमालयी औषधीय पादपों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। उन्होंने औषधीय पादप संपदा को संरक्षित करके हिमालयी क्षेत्र में रह रहें लोगों के लिए इन्हें जीविका के साधन के रूप में बढ़ावा देने की बात कही। हिमालयी क्षेत्रों में पाई जानी वाली विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से प्रवासी लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सकता है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आरएस रावल ने कहा कि हिमालयी औषधीय पादपों की खेती को बढ़ावा देकर कोरोना के समय में उत्पन्न बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है। पहले सत्र में सेवानिवृत्त पीसीसीएफ हिमाचल प्रदेश डॉ. जीएस गोराया और एचएफआरआई शिमला के निदेशक डॉ. एसएस सामंत ने जड़ी-बूटियों का महत्व बताते हुए उनके आकलन की जानकारी दी।
विज्ञापन
दूसरे सत्र में सीएसआईआरआई एचबीटी पालमपुर के निदेशक डॉ. संजय कुमार, जड़ी-बूटी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. सीएस सनवाल, ईएमआरसी के एक्जीक्यूटिव निदेशक डॉ. केएस रावत ने विचार रखे। तीसरे सत्र में एनएमपीबी नई दिल्ली के सीईओ डॉ. जेएलएन शास्त्री, प्रो. वाईपीएस परमार रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. बीएस कालाकोटी, सीएपी देहरादून की निदेशक डॉ. हेमा लोहनी ने उद्योगों और बाजार में औषधि की प्रचुर मात्रा में जरूरत का विश्लेषण किया।
विज्ञापन
अंतिम सत्र में एनआरआई सूवा रिसपा लेह के निदेशक डॉ. पदम गुरमेट, सीएसआईआर जम्मू के वैज्ञानिक डॉ. सुमित गैरोला, एचएपीपीआरसी श्रीनगर गढ़वाल के प्रो. एमसी नौटियाल ने पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक शोध के समन्वय से औषधीय पादपों के कृषिकरण को बढ़ावा देने पर चर्चा की। इससे पूर्व प्रो. वाईपीएस पांगती शोध प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. बीएस कालाकोटी ने सभी का स्वागत किया। भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून के पूर्व निदेशक डॉ. जीएस रावत ने कार्यक्रम की अगुवाई की। पर्यावरण संस्थान के डॉ. आईडी भट्ट और कुमाऊं विवि के प्रो. ललित तिवारी ने आभार जताया।