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Almora News: सोमेश्वर घाटी में धान की कई प्रजातियां हुई विलुप्त

Sat, 16 May 2026 11:11 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा Updated Sat, 16 May 2026 11:11 PM IST
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Many rice varieties became extinct in Someshwar Valley.
अल्मोड़ा। धान की खेती के लिए प्रसिद्ध सोमेश्वर घाटी में पारंपरिक धान की कई प्रजातियां अब खेती से पूरी तरह गायब हो चुकी है। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के शोध में यह चौंकाने वाले तथ्य सामने पाए हैं। शोधार्थियों के मुताबिक पहाड़ में हो रहे जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की घटती उर्वरता और कीटों के बढ़ते प्रकोप से धान की अन्य प्रजातियां भी संकट में हैं।
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एसएसजे विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने सोमेश्वर घाटी में चैना, थपचिनी, लाल धान, नान धान, बासमती, बाकुल, अंजन धान, साव धान, हंसराज, सुंखोरी, बौराड़ी धान और तैचुनी धान 12 धान की किस्मों पर अध्ययन किया। अध्ययन के लिए भंडारी, रैत, डालमोड़ी, फलिया, पल्यूरा और रतखोला गांव को चुना गया। शोध में सामने आया कि हंसराज, तैचुनी और बाकुल किस्में अब खेती से पूरी तरह बाहर हो चुकी हैं। जबकि चैना और बासमती जैसी किस्मों की पैदावार में लगातार गिरावट आई है। ऐेसे में किसानों के लिए इन सुगंध, स्वाद से भरपूर और धार्मिक महत्व रखने वाली धान की प्रजातियों को संरक्षित करना चुनौती बन गया है।
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शोधार्थियों ने जताई चिंता
- शोधार्थियों ने कहा कि समय रहते इन प्रजातियों को संरक्षण नहीं किया गया तो हिमालयी क्षेत्र में कृषि जैव विविधता को खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने धान की प्रजातियों के संरक्षण के लिए इन सीटू और एक्स सीटू संरक्षण, किसानों को प्रशिक्षण, जल एवं कीट प्रबंधन सुधार, बाजार सुविधा, मूल्य संवर्धन और खेती में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात कही।
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लाल धान और थपचिनी धान ने जगाई उम्मीद
शोध में सामने आया कि लाल धान और थपचिनी धान ने विपरीत परिस्थितियों में बेहतर स्थिरता और अनुकूलन क्षमता दिखाई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक ये पारंपरिक किस्में भविष्य की जलवायु अनुकूल खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण शाबित हो सकती हैं।
पैदावार घटने का प्रमुख कारण
धान की प्रजातियां जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, पानी की कमी, घटती मिट्टी उर्वरता, बढ़ते कीट प्रकोप और पलायन के कारण से प्रभावित हो रही है। बंदर, जंगली सूअर से फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में किसान पारंपरिक खेती छोड़ने को मजबूर हैं।

धान किस्मों की खासियत

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प्रजाति विशेषता

चैना केवल वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगाई जाती है, जहां सिंचाई उपलब्ध नहीं होती

थापचिनी पकने के बाद स्वादिष्ट, भोजन के लिए पसंदीदा किस्म

हंसराज
छोटे दाने वाली किस्म, खास व्यंजनों के लिए उपयुक्त

बासमती सुगंधित और लंबे दानों वाली प्रसिद्ध किस्म

लाल धान
लाल रंग का धान, चूड़ा बनाने में उपयोग

सव धान
धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा में उपयोग होने वाली विशेष किस्म

तैचुनी धान
आटा बनाने के लिए उपयोग, रोटी और मिठाइयां तैयार की जाती हैं।

बौराड़ी धान
पशुओं के चारे के रूप में उपयोग

नान धान
सुगंधित किस्म, पकने पर मात्रा बढ़ जाती है, इसलिए किफायती

सुनखोरी बड़े दाने वाली सूखा सहनशील किस्म, कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।

बाकुल
सूखे क्षेत्रों में उगाई जाने वाली पारंपरिक किस्म

अंजन धान स्वादिष्ट और पौष्टिक पहाड़ की जलवायु के अनुकूल

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सोमेश्वर घाटी में धान का उत्पादन पूर्व और वर्तमान में
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प्राजाति वर्ष 2000 में क्षेत्रफल (वर्ग फीट) उत्पादन (किग्रा) उत्पादन (किग्रा)

चैना 3,240 150
100

थापचिनी 6,480 160
150

नान धान
3,240 100
50

बासमती
4,320 100
75

हंसराज
2,160 50
खेती बंद

सव धान
2,160 75
50

लाल धान
6,480 100 150

तैचनी धान
2,160 50
खेती बंद

बाकुल 2,160 50
खेती बंद

अंजन धान
4,320 100
40

सुनखोरी 6,480 100 70

बौराड़ी धान
2,160 100 50

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कोट
- सोमेश्वर घाटी में अध्ययन के दौरान धान की कई प्रजातियों की खेत बंद हो चुकी है। इन प्रजातियों के विलुप्त होने से पहाड़ की जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत पर बड़ा संकट है। इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए जल्द ठोस प्रयास करने की जरूरत है। — डॉ. धनी आर्या, वनस्पति विज्ञान विभाग, एसएसजे विश्वविद्यालय अल्मोड़ा
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