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सांस्कृतिक सरोकार से सराबोर है स्याल्दे बिखौती
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, (चौखुटिया) अल्मोड़ा
Updated Sun, 12 Apr 2015 11:34 PM IST
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इंटरनेट और मोबाइल के युग की चकाचाैंध के बीच परंपरागत मेलों का रंग और ढंग भी बदलने लगा है। इसके बावजूद सांस्कृतिक सरोकारों से सराबोर स्याल्दे बिखौती मेला आज भी परंपरा को जीवित रखकर अपनी चमक बरकरार रखे हुए है।
भौतिकवादी युग की दौड़ती जिंदगी के बीच लोगों की तरह मेलों का मिजाज भी बदलता जा रहा है। किसी जमाने में मेले मेल-मिलाप का प्रतीक माने जाते थे। उस समय मनोरंजन के साधन कम थे और सड़कें न होने से अधिकांश लोगों का आवागमन पैदल होता था। घर की महिलाएं और पुरुष कृषि के अलावा पशुपालन आदि में व्यस्त रहते थे। अभाव भरी ऐसी दिनचर्चा के बीच मेलों में बड़ा सुकून मिलता था।
मेले में मेल-मिलाप तो होता ही था, साथ ही दूर गांव से पहुंचने वाले लोग इसी बहाने जरूरी सामान आदि भी खरीद लेते थे। बदलते जमाने के साथ ही अब मेलों के प्रति लोगों में पहले जैसा रुझान तो नहीं रहा अलबत्ता स्याल्दे बिखौती जैसे कुछ मेले आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान के सहारे लोकप्रियता को बरकरार रखकर अपनी चमक बनाए हुए हैं।
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स्याल्दे बिखौती मेले को लेकर पहले द्वाराहाट के प्रवासियों और बाहर नौकरी करने वाले लोगों में भी बड़ा उत्साह रहता था। लोग स्याल्दे बिखौती मेले के मद्देनजर छुट्टियां बचाकर रखते थे। कर कोई गांवों में होने वाले झोड़ों में शामिल होने को उत्सुक रहता था। जिससे मुख्य मेले से कई दिन पहले ही क्षेत्र के हर गांव में मेले जैसा माहौल हो जाता था।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लोग मेले में नए कपड़े पहनकर पहुंचते थे। कहा जाता है कि स्याल्दे बिखौती मेले से दो माह पूर्व ही निकटवर्ती गावों का हर दर्जी व्यस्त हो जाता था। कार्य की अधिकता के चलते दर्जी रात-दिन काम कर किसी तरह सभी लोगों के कपडे़ सिल पाता था।
स्याल्दे बिखौती मेले में पहले तिमली के पात में रखकर ककड़ी और मूली का रायता, दही में सना नींबू आदि भी खूब मिलता था। जो अब अपवादों को छोड़ नजर नहीं आता है। इसी तरह खांड के बने गट्टे और मिसरी भी धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं। अलबत्ता जलेबी का रुतबा अभी बरकरार है। लोग मेले से घरों को लौटते समय जलेबी अवश्य ले जाते हैं।
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भौतिकवादी युग की दौड़ती जिंदगी के बीच लोगों की तरह मेलों का मिजाज भी बदलता जा रहा है। किसी जमाने में मेले मेल-मिलाप का प्रतीक माने जाते थे। उस समय मनोरंजन के साधन कम थे और सड़कें न होने से अधिकांश लोगों का आवागमन पैदल होता था। घर की महिलाएं और पुरुष कृषि के अलावा पशुपालन आदि में व्यस्त रहते थे। अभाव भरी ऐसी दिनचर्चा के बीच मेलों में बड़ा सुकून मिलता था।
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मेले में मेल-मिलाप तो होता ही था, साथ ही दूर गांव से पहुंचने वाले लोग इसी बहाने जरूरी सामान आदि भी खरीद लेते थे। बदलते जमाने के साथ ही अब मेलों के प्रति लोगों में पहले जैसा रुझान तो नहीं रहा अलबत्ता स्याल्दे बिखौती जैसे कुछ मेले आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान के सहारे लोकप्रियता को बरकरार रखकर अपनी चमक बनाए हुए हैं।
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स्याल्दे बिखौती मेले को लेकर पहले द्वाराहाट के प्रवासियों और बाहर नौकरी करने वाले लोगों में भी बड़ा उत्साह रहता था। लोग स्याल्दे बिखौती मेले के मद्देनजर छुट्टियां बचाकर रखते थे। कर कोई गांवों में होने वाले झोड़ों में शामिल होने को उत्सुक रहता था। जिससे मुख्य मेले से कई दिन पहले ही क्षेत्र के हर गांव में मेले जैसा माहौल हो जाता था।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लोग मेले में नए कपड़े पहनकर पहुंचते थे। कहा जाता है कि स्याल्दे बिखौती मेले से दो माह पूर्व ही निकटवर्ती गावों का हर दर्जी व्यस्त हो जाता था। कार्य की अधिकता के चलते दर्जी रात-दिन काम कर किसी तरह सभी लोगों के कपडे़ सिल पाता था।
स्याल्दे बिखौती मेले में पहले तिमली के पात में रखकर ककड़ी और मूली का रायता, दही में सना नींबू आदि भी खूब मिलता था। जो अब अपवादों को छोड़ नजर नहीं आता है। इसी तरह खांड के बने गट्टे और मिसरी भी धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं। अलबत्ता जलेबी का रुतबा अभी बरकरार है। लोग मेले से घरों को लौटते समय जलेबी अवश्य ले जाते हैं।