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खेतों में काम की थकान से चूर किसानों को नई ऊर्जा देता है हुड़किया बौल
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जैंती तहसील के कुटौली गांव में लगे हुड़किया बौल में हुड़के की थाप पर गीत गाते गायक किशन सिंह बिष्?
- फोटो : ALMORA
जैंती (पूरन भंडारी)। उत्तराखंड में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है। गांव से होते पलायन और सिमटती खेती के साथ ही लोक गायन की सदियों पुरानी हुड़किया बौल गायन विधा भी कम होते जा रही है। डिजिटल युग में अधिकतर पर्वतीय इलाकों मेें हुड़किया बौल की परंपरा समाप्त हो चुकी है लेकिन जैंती तहसील क्षेत्र के कुछ गांवों में आज भी हुड़किया बौल गायन की विधा जिंदा है। तहसील के कुटौली गांव में हुड़किया बौल लगाकर मडुवे की फसल की गुड़ाई की जा रही है। हुड़किया बौल गायक की आवाज खेतों में काम करने के लिए प्रेरित करती है और काम करने वालों में ऊर्जा का संचार करने के साथ ही थकान का भी अहसास नहीं होने देती है।
जैंती तहसील के कुटौली गांव ने उत्तराखंड लोक गायन की सदियों पुरानी हुड़किया बौल परंपरा को आज भी सहेज कर रखा है। कुटौली गांव समेत आसपास के गांवों में इन दिनों मडुआ की गुड़ाई की जा रही है। डिजिटल इंडिया के दौर में अब गांवों में भी बहुत तेजी से बदलाव हुआ है। बहुत कुछ बदल गया है। हुड़किया बौल गायन भी कम हो गया है लेकिन जैंती इलाके में आज भी हुड़किया बौल के मधुर स्वर सुनाई देते हैं।
कुटौली गांव निवासी डुंगर सिंह बिष्ट इन दिनों अपने खेतों में मडुआ की गुड़ाई कर रहे हैं। उन्होंने खेतों में हुड़किया बौल लगाया है। हुड़किया बौल के अंतर्गत हुड़किया बौल गायक किशन सिंह बिष्ट ने रोपाई करने वालों के आगे हुड़के की थाप पर ‘दैण होया भूमि का भूमियाला देवा..’ जैसे लोक गीत गाकर मडुए की गुड़ाई की शुरुआत कराई। इस दौरान राजुला मालूशाही, हरुहीत, सौना मौना वीर, कत्यूरी, चंद राजाओं आदि की लोक गाथाएं गाई गईं। उनके साथ गीतों को दोहराकर महिलाएं मडुआ की गुड़ाई करते-करते आगे बढ़ते चली गईं।
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हुड़किया बौल के बीच किसानों को सावन की दोपहरी में भी खेतों में काम की थकान बिलकुल भी महसूस नहीं हुई। काम के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी हुआ। कृषि कार्य को हंसी ठिठोली के साथ सरलता और मनोरंजन के साथ पूरा किया। अब जबकि खेती सिकुड़ती चली जा रही है और लोग गांव से पलायन कर रहे है। ऐसे में इस हुड़किया बौल की विधा को आने वाली पीढ़ी के लिए जीवंत रखना एक चुनौती है। (संवाद)
देव वंदना के बाद गाया जाता है हुड़किया बौल
जैंती। पर्वतीय क्षेत्रों में मडुवे की गोड़ाई और धान की रोपाई करने के दौरान हुड़किया बौल गाया जाता है। भूमि के देवता भूमियां, पानी के देवता इंद्र और छाया के देव मेघ की विधिवत वंदना से हुड़किया बौल की शुरूआत होती है। वंदना पूरी होने के बाद बौल गायक वीर रस के अंतर्गत अजुवा बफौल, भागा महारानी, जुमला बौरानी, वात्सल्य रस के अंतर्गत राजुला मालूशाही, सिदु-बिदु की गाथाओं का बखान किया जाता है। खेतों में हुड़के की थाप पर हुड़किया बौल के गीत से गोड़ाई का काम तेजी से संपन्न होता है।
हुड़किया बौल के संरक्षण की जरूरत
जैंती। कुटौली गांव निवासी हुड़किया बौल गायक किशन सिंह बिष्ट ने कहा कि हुड़किया बौल, भगनौल, न्यौली, चांचरी, झोड़ा आदि लोक गायन की विधाओं के नाम अब पहाड़ के बूढ़े-बुजुर्गों की ही जुबान पर रह गए हैं। नई पीढ़ी इन्हें भूल चुकी है। डिजिटल दुनिया में युवा पीढ़ी को इन चीजों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। हुड़किया बौल समेत अन्य लोक गीतों में जीवन का सार दिखता है। सदियों पुरानी लोक गायन की इन विधाओं को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास सभी को करना चाहिए।
हुड़किया बौल गीत ...
दैंणा है जाया हो भुमियां देवा..
दैंणा है जाया हो धरती माता..
सेलो दिया बितो हो धरती माता..
दैंणा है जाया हो पंचनाम देवा..
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जैंती तहसील के कुटौली गांव ने उत्तराखंड लोक गायन की सदियों पुरानी हुड़किया बौल परंपरा को आज भी सहेज कर रखा है। कुटौली गांव समेत आसपास के गांवों में इन दिनों मडुआ की गुड़ाई की जा रही है। डिजिटल इंडिया के दौर में अब गांवों में भी बहुत तेजी से बदलाव हुआ है। बहुत कुछ बदल गया है। हुड़किया बौल गायन भी कम हो गया है लेकिन जैंती इलाके में आज भी हुड़किया बौल के मधुर स्वर सुनाई देते हैं।
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कुटौली गांव निवासी डुंगर सिंह बिष्ट इन दिनों अपने खेतों में मडुआ की गुड़ाई कर रहे हैं। उन्होंने खेतों में हुड़किया बौल लगाया है। हुड़किया बौल के अंतर्गत हुड़किया बौल गायक किशन सिंह बिष्ट ने रोपाई करने वालों के आगे हुड़के की थाप पर ‘दैण होया भूमि का भूमियाला देवा..’ जैसे लोक गीत गाकर मडुए की गुड़ाई की शुरुआत कराई। इस दौरान राजुला मालूशाही, हरुहीत, सौना मौना वीर, कत्यूरी, चंद राजाओं आदि की लोक गाथाएं गाई गईं। उनके साथ गीतों को दोहराकर महिलाएं मडुआ की गुड़ाई करते-करते आगे बढ़ते चली गईं।
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हुड़किया बौल के बीच किसानों को सावन की दोपहरी में भी खेतों में काम की थकान बिलकुल भी महसूस नहीं हुई। काम के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी हुआ। कृषि कार्य को हंसी ठिठोली के साथ सरलता और मनोरंजन के साथ पूरा किया। अब जबकि खेती सिकुड़ती चली जा रही है और लोग गांव से पलायन कर रहे है। ऐसे में इस हुड़किया बौल की विधा को आने वाली पीढ़ी के लिए जीवंत रखना एक चुनौती है। (संवाद)
देव वंदना के बाद गाया जाता है हुड़किया बौल
जैंती। पर्वतीय क्षेत्रों में मडुवे की गोड़ाई और धान की रोपाई करने के दौरान हुड़किया बौल गाया जाता है। भूमि के देवता भूमियां, पानी के देवता इंद्र और छाया के देव मेघ की विधिवत वंदना से हुड़किया बौल की शुरूआत होती है। वंदना पूरी होने के बाद बौल गायक वीर रस के अंतर्गत अजुवा बफौल, भागा महारानी, जुमला बौरानी, वात्सल्य रस के अंतर्गत राजुला मालूशाही, सिदु-बिदु की गाथाओं का बखान किया जाता है। खेतों में हुड़के की थाप पर हुड़किया बौल के गीत से गोड़ाई का काम तेजी से संपन्न होता है।
हुड़किया बौल के संरक्षण की जरूरत
जैंती। कुटौली गांव निवासी हुड़किया बौल गायक किशन सिंह बिष्ट ने कहा कि हुड़किया बौल, भगनौल, न्यौली, चांचरी, झोड़ा आदि लोक गायन की विधाओं के नाम अब पहाड़ के बूढ़े-बुजुर्गों की ही जुबान पर रह गए हैं। नई पीढ़ी इन्हें भूल चुकी है। डिजिटल दुनिया में युवा पीढ़ी को इन चीजों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। हुड़किया बौल समेत अन्य लोक गीतों में जीवन का सार दिखता है। सदियों पुरानी लोक गायन की इन विधाओं को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास सभी को करना चाहिए।
हुड़किया बौल गीत ...
दैंणा है जाया हो भुमियां देवा..
दैंणा है जाया हो धरती माता..
सेलो दिया बितो हो धरती माता..
दैंणा है जाया हो पंचनाम देवा..