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भारतीय संस्कृति में खगोलशास्त्र का स्वर्णिम इतिहास : नौड़ियाल
Sat, 30 Mar 2019 11:45 PM IST
बृजमोहन बृजमोहन
अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
Published by: बृजमोहन बृजमोहन
Updated Sat, 30 Mar 2019 11:45 PM IST
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एसएसजे परिसर अल्मोड़ा में स्मारिका का विमोचन करते कुलपति प्रो. डीके नौडियाल और अन्य।
- फोटो : AMAR UJALA
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एसएसजे परिसर अल्मोड़ा के इतिहास विभाग की ओर से चित्रकला विभाग के सभागार में भारतीय संस्कृति और विश्व स्तर पर इसके प्रभाव विषय पर दो दिवसीय सेमिनार शुरू हो गया है। मुख्य अतिथि कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में खगोलशास्त्र, गणित, चिकित्सा आदि का स्वर्णिम इतिहास रहा है। इस मौके पर 75 शोध पत्र पढ़े गए।
जर्मनी से पहुंचीं मुख्य वक्ता डॉ. मारिया वृत ने कहा कि देववाणी संस्कृत भाषा पर पश्चिम में भी शोध कार्य का सिलसिला निरंतर बढ़ रहा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप भगवान में विश्वास की धारणा पर कहा कि भारत में दैवीय प्रभाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। विशिष्ट अतिथि प्रो. आरएस अग्रवाल ने युवाओं से भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने का आह्वान किया। सेमिनार के निदेशक प्रो. सीएम अग्रवाल ने सभी प्रतिभागियों को सेमिनार के बारे में जानकारी दी। प्रो. संजय टम्टा ने भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटम्बकम के भाव पर व्याख्यान दिया।
उद्घाटन सत्र में मर्म चिकित्सा मर्मज्ञ डॉ. एसके जोशी ने योग के आधार पर भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता की जानकारी दी। कुलपति और अन्य ने भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रभाव विषय पर स्मारिका का विमोचन किया। परिसर के कला संकायाध्यक्ष प्रो. एसए हामिद ने अतिथियों का आभार जताया। प्रो. संजय टम्टा ने बताया कि तकनीकी सत्र में 75 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। अध्यक्षता परिसर निदेशक प्रो.आरएस पथनी और संचालन प्रो. वीडीएस नेगी ने किया। इस मौके पर प्रो. दया पंत, डॉ. इंदू रावत, प्रो. अनिल जोशी, डॉ. सीपी फुलोरिया, प्रो. इला साह, प्रो. अरविंद अधिकारी, प्रो. निर्मला पंत, रवि कुमार, डॉ. ललित जोशी, जीवन भट्ट, चंदन पांडे, दयावर्धन, दीपा भंडारी, दिव्या तनवार, प्रो. प्रेमलता पंत, प्रो. गिरीश पंत आदि मौजूद थे।
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जर्मनी से पहुंचीं मुख्य वक्ता डॉ. मारिया वृत ने कहा कि देववाणी संस्कृत भाषा पर पश्चिम में भी शोध कार्य का सिलसिला निरंतर बढ़ रहा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप भगवान में विश्वास की धारणा पर कहा कि भारत में दैवीय प्रभाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। विशिष्ट अतिथि प्रो. आरएस अग्रवाल ने युवाओं से भारतीय संस्कृति को आत्मसात करने का आह्वान किया। सेमिनार के निदेशक प्रो. सीएम अग्रवाल ने सभी प्रतिभागियों को सेमिनार के बारे में जानकारी दी। प्रो. संजय टम्टा ने भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटम्बकम के भाव पर व्याख्यान दिया।
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उद्घाटन सत्र में मर्म चिकित्सा मर्मज्ञ डॉ. एसके जोशी ने योग के आधार पर भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता की जानकारी दी। कुलपति और अन्य ने भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रभाव विषय पर स्मारिका का विमोचन किया। परिसर के कला संकायाध्यक्ष प्रो. एसए हामिद ने अतिथियों का आभार जताया। प्रो. संजय टम्टा ने बताया कि तकनीकी सत्र में 75 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। अध्यक्षता परिसर निदेशक प्रो.आरएस पथनी और संचालन प्रो. वीडीएस नेगी ने किया। इस मौके पर प्रो. दया पंत, डॉ. इंदू रावत, प्रो. अनिल जोशी, डॉ. सीपी फुलोरिया, प्रो. इला साह, प्रो. अरविंद अधिकारी, प्रो. निर्मला पंत, रवि कुमार, डॉ. ललित जोशी, जीवन भट्ट, चंदन पांडे, दयावर्धन, दीपा भंडारी, दिव्या तनवार, प्रो. प्रेमलता पंत, प्रो. गिरीश पंत आदि मौजूद थे।
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