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वनाग्नि से निकला ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को ढाई मीटर तक और पीछे खिसका देगा
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डा. जेसी कुनियाल, पर्यावरण वैज्ञानिक,
- फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। वनाग्नि से निकल रहा ब्लैक कार्बन हिमालय के लिए बहुत खतरनाक साबित हो रहा है। यह ग्लेशियरों को तेजी से पिघला रहा है और उसके पिघलने की सालाना वृद्धि दर को बढ़ा रहा है। अनुमान है कि यह ग्लेशियरों को ढाई मीटर तक और पीछे खिसका सकता है।
हिमालय में मौजूद ग्लेशियर हर साल पिघलकर पीछे की ओर खिसक रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों में कहीं पर ज्यादा और कहीं पर कम बर्फ का जमाव होता है।
जहां कम बर्फ का जमाव होता है वहां करीब 17 मीटर तक और जहां ज्यादा बर्फ का जमाव होता है वहां करीब आठ मीटर तक बर्फ पिघलने की वजह से ग्लेशियर हर साल पीछे की ओर चले जाते हैं। वनाग्नि के बाद यह स्थिति और ज्यादा चिंताजनक होती जा रही है।
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कोसी कटारमल स्थित जीबी पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान के पर्यावरण वैज्ञानिक डा. जेसी कुनियाल बताते हैं कि ब्लैक कार्बन 0.5 माइक्रोन के छोटे आकार होता है।
जंगल की आग की वजह से पैदा हो रहा ब्लैक कार्बन हवा के माध्यम से भारी मात्रा में उड़कर हिमालय तक पहुंच रहा है और वहां बर्फ पर जम रहा है।
यह गर्मी को ज्यादा अवशोषित करता है, जिससे बर्फ ज्यादा गति से पिघलने लगती है। बताया कि यही कारण है कि वनाग्नि की वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ रही है।
इनके पिघलने में 10 से 15 प्रतिशत तक की और बढ़ोत्तरी हो रही है। इस वजह से वनाग्नि के प्रभाव से इस साल ग्लेशियर करीब 0.8 मीटर से लेकर 2.5 मीटर तक और अधिक पीछे की ओर जा सकते हैं।
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हिमालय में मौजूद ग्लेशियर हर साल पिघलकर पीछे की ओर खिसक रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों में कहीं पर ज्यादा और कहीं पर कम बर्फ का जमाव होता है।
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जहां कम बर्फ का जमाव होता है वहां करीब 17 मीटर तक और जहां ज्यादा बर्फ का जमाव होता है वहां करीब आठ मीटर तक बर्फ पिघलने की वजह से ग्लेशियर हर साल पीछे की ओर चले जाते हैं। वनाग्नि के बाद यह स्थिति और ज्यादा चिंताजनक होती जा रही है।
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कोसी कटारमल स्थित जीबी पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान के पर्यावरण वैज्ञानिक डा. जेसी कुनियाल बताते हैं कि ब्लैक कार्बन 0.5 माइक्रोन के छोटे आकार होता है।
जंगल की आग की वजह से पैदा हो रहा ब्लैक कार्बन हवा के माध्यम से भारी मात्रा में उड़कर हिमालय तक पहुंच रहा है और वहां बर्फ पर जम रहा है।
यह गर्मी को ज्यादा अवशोषित करता है, जिससे बर्फ ज्यादा गति से पिघलने लगती है। बताया कि यही कारण है कि वनाग्नि की वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ रही है।
इनके पिघलने में 10 से 15 प्रतिशत तक की और बढ़ोत्तरी हो रही है। इस वजह से वनाग्नि के प्रभाव से इस साल ग्लेशियर करीब 0.8 मीटर से लेकर 2.5 मीटर तक और अधिक पीछे की ओर जा सकते हैं।