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तो अपने ही प्रदेश में उपेक्षित हो रही को-आपरेटिव ड्रग फैक्ट्री
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रानीखेत की को-आपरेटिव ड्रग फैक्ट्री। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। गनियाद्योली स्थित कोऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री (सीडीएफ) बदहाली के दौर से गुजर रही है। आठ साल पहले सवा करोड़ रुपये सालाना का मुनाफा कमाने वाली यह फैक्ट्री अब हर साल डेढ़ करोड़ से अधिक का नुकसान उठा रही है। आयुर्वेदिक पद्धति से सैकड़ों किस्म की दवाइयां बनाने के लिए मशहूर इस फैक्ट्री को अब जड़ी बूटियों के लिए भी दूसरे प्रदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस कारण अब केवल मांग पर ही दवाइयां बन रही हैं। दो साल से इस कंपनी को दवा उत्पादन के लिए ऑर्डर भी नहीं मिले हैं।
भारत रत्न स्व. पं. गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1954 में गनियाद्योली में केसीडीएफ की भूमि पर ड्रग फैक्ट्री की स्थापना की। फैक्ट्री के पास ही भेषज विकास संघ की भूमि पर जड़ी बूटियों का उत्पादन होता था। इनमें च्यवनप्राश, आसव, अशोकारिस्ट, त्रिफला, गुगुल, गंधक रसायन, अभ्रक भष्म, लवण भाष्कर चूर्ण, आसव बटिया सहित उदर रोगों और गठिया वात से संबंधित कुल 300 प्रकार की दवाइयां शामिल हैं। राज्य बनने के बाद फैक्ट्री के दिन बहुरने की उम्मीद थी, लेकिन सरकारों के उदासीन रवैये के कारण भेषज कार्यालय ही बंद हो गया। जड़ी बूटियों का उत्पादन भी ठप हो गया। अब फैक्ट्री को जड़ी बूटियों के लिए दिल्ली, हरिद्वार, हाथरस अन्य प्रदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। चार प्रतिशत महंगे दामों पर जड़ी बूटियां यहां तक पहुंचती हैं। वर्ष 2005 में इसके संचालन की जिम्मेदारी उत्तराखंड कोऑपरेटिव संघ को मिली। इसके बाद कुछ साल आमद भी अच्छी हुई और फैक्ट्री लाभ में भी रही लेकिन पिछले दो सालों से उत्तराखंड से भी यहां दवाइयों के आदेश नहीं मिल सके हैं।
वर्षवार कारोबार
वर्ष फैक्ट्री में कारोबार नफा/नुकसान
2010-11 923 लाख 19.90 लाख का घाटा
11-12 1083.45 लाख 130.69 लाख का फायदा
12-13 562.77 लाख 86.63 लाख का घाटा
13-14 719.45 लाख 68.81 लाख का घाटा
14-15 805.33 लाख 11.42 लाख का फायदा
15-16 701.47 लाख 87.85 लाख रुपये का घाटा
16-17 805.13 लाख 119.52 लाख का घाटा
17-18 662.00 लाख 152.65 लाख का घाटा
18-19 205.44 लाख 173.90 लाख रुपये घाटा
-उत्तराखंड की निविदा की अभी फाइनेंशियल बिड नहीं खुली है। कोई पार्टी कोर्ट चली गई थी। हरियाणा टेंडर को भी तकनीकी रूप से फेल कर दिया है। अन्य राज्य अपने यहां 50 प्रतिशत की छूट देते हैं, लेकिन अपने प्रदेश में हमें टेंडर प्रक्रिया में खड़ा होना पड़ रहा है। फिलहाल प्रदेश से उत्पादों के लिए कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।
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-जीएस पंवार, प्रबंधक, ड्रग फैक्ट्री।
-कभी साढे़ तीन सौ कर्मचारी इस ड्रग फैक्ट्री में कार्य करते थे, लेकिन अब मात्र 15 से 16 कर्मचारी रह गए हैं। सरकारों ने अपने ही संसाधनों को विकसित करने की तरफ ध्यान नहीं दिया, इसका ताजा उदाहरण ड्रग फैक्ट्री है। उत्तराखंड ही नहीं, दूसरे राज्यों से भी दवा उत्पादन के आदेश नहीं मिलेे हैं। इसे अब निजी हाथों में सौंपने की भी तैयारी चल रही है, जिसे सफल नहीं होने दिया जाएगा।
-मोहन नेगी, अध्यक्ष, श्रमिक संघ, कोऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री रानीखेत।
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भारत रत्न स्व. पं. गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1954 में गनियाद्योली में केसीडीएफ की भूमि पर ड्रग फैक्ट्री की स्थापना की। फैक्ट्री के पास ही भेषज विकास संघ की भूमि पर जड़ी बूटियों का उत्पादन होता था। इनमें च्यवनप्राश, आसव, अशोकारिस्ट, त्रिफला, गुगुल, गंधक रसायन, अभ्रक भष्म, लवण भाष्कर चूर्ण, आसव बटिया सहित उदर रोगों और गठिया वात से संबंधित कुल 300 प्रकार की दवाइयां शामिल हैं। राज्य बनने के बाद फैक्ट्री के दिन बहुरने की उम्मीद थी, लेकिन सरकारों के उदासीन रवैये के कारण भेषज कार्यालय ही बंद हो गया। जड़ी बूटियों का उत्पादन भी ठप हो गया। अब फैक्ट्री को जड़ी बूटियों के लिए दिल्ली, हरिद्वार, हाथरस अन्य प्रदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। चार प्रतिशत महंगे दामों पर जड़ी बूटियां यहां तक पहुंचती हैं। वर्ष 2005 में इसके संचालन की जिम्मेदारी उत्तराखंड कोऑपरेटिव संघ को मिली। इसके बाद कुछ साल आमद भी अच्छी हुई और फैक्ट्री लाभ में भी रही लेकिन पिछले दो सालों से उत्तराखंड से भी यहां दवाइयों के आदेश नहीं मिल सके हैं।
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वर्षवार कारोबार
वर्ष फैक्ट्री में कारोबार नफा/नुकसान
2010-11 923 लाख 19.90 लाख का घाटा
11-12 1083.45 लाख 130.69 लाख का फायदा
12-13 562.77 लाख 86.63 लाख का घाटा
13-14 719.45 लाख 68.81 लाख का घाटा
14-15 805.33 लाख 11.42 लाख का फायदा
15-16 701.47 लाख 87.85 लाख रुपये का घाटा
16-17 805.13 लाख 119.52 लाख का घाटा
17-18 662.00 लाख 152.65 लाख का घाटा
18-19 205.44 लाख 173.90 लाख रुपये घाटा
-उत्तराखंड की निविदा की अभी फाइनेंशियल बिड नहीं खुली है। कोई पार्टी कोर्ट चली गई थी। हरियाणा टेंडर को भी तकनीकी रूप से फेल कर दिया है। अन्य राज्य अपने यहां 50 प्रतिशत की छूट देते हैं, लेकिन अपने प्रदेश में हमें टेंडर प्रक्रिया में खड़ा होना पड़ रहा है। फिलहाल प्रदेश से उत्पादों के लिए कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।
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-जीएस पंवार, प्रबंधक, ड्रग फैक्ट्री।
-कभी साढे़ तीन सौ कर्मचारी इस ड्रग फैक्ट्री में कार्य करते थे, लेकिन अब मात्र 15 से 16 कर्मचारी रह गए हैं। सरकारों ने अपने ही संसाधनों को विकसित करने की तरफ ध्यान नहीं दिया, इसका ताजा उदाहरण ड्रग फैक्ट्री है। उत्तराखंड ही नहीं, दूसरे राज्यों से भी दवा उत्पादन के आदेश नहीं मिलेे हैं। इसे अब निजी हाथों में सौंपने की भी तैयारी चल रही है, जिसे सफल नहीं होने दिया जाएगा।
-मोहन नेगी, अध्यक्ष, श्रमिक संघ, कोऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री रानीखेत।