पिरूल से कोयला बनाने की मुहिम ने तोड़ा दम
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। चीड़ के पिरूल से कोयला बनाने की मुहिम चार साल में ही दम तोड़ गई है। वनों में आग की घटनाओं पर नियंत्रण करने और ग्रामीणों को इसके माध्यम से रोजगार से जोड़ने के लिए वन विभाग ने यह मुहिम शुरू की थी। विभाग ने क्षेत्र में तीन स्थानों पर दो लाख रुपये की लागत से तीन कोयला बनाने की मशीनें भी स्थापित की थीं। वन पंचायत सरपंचों को कोयला बनाने का दायित्व सौंपा गया था। दो साल तक भट्टियों में कोयला भी बना, लेकिन अचानक कोयला बनाने की प्रक्रिया ठप हो गई। अब मशीनें जंक खा रही हैं और जंगलों में गिरा बेतहाशा पिरूल आग की घटनाओं को दावत दे रहा है।
चार साल पूर्व पर्यटन नगरी से लगे द्वारसौं, सौनी और गैरगांव में विभाग ने पिरूल से कोयला बनाने की भट्टियां स्थापित की गई थीं। 60-60 हजार की लागत से तीन मशीनें भी लगाई गईं। कोयला बनाने में उपयोग होने वाला सीरा और बिजली का खर्च भी विभाग की तरफ से दिया जा रहा था। जिन स्थानों पर यह भट्टियां और मशीनें स्थापित की गईं, उस क्षेत्र के सरपंच को पिरूल से कोयला बनाने का दायित्व सौंपा गया। ग्रामीण बेरोजगार पिरूल इकट्ठा कर उसे सरपंच को एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से दे रहे थे। इससे बेरोजगारों को रोजगार भी मिल रहा था।
गैरगांव में सरपंच भूपाल सिंह भंडारी की देखरेख में कोयला बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई। ग्रामीण महिलाओं को भी इस कार्य में दक्ष किया गया। पिरूल का कोयला 15 रुपये किलो के हिसाब से बेचा भी गया, कोयले में तपन भी अच्छी थी, लेकिन अचानक यह मुहिम दम तोड़ गई। दूसरी तरफ कोयला बनाने वाली कंपनियां भी अब पिरूल उठाने का कार्य नहीं कर रही है। इस बार आमंत्रित करने के बावजूद कोई भी कंपनी निविदा भरने नहीं आई। जंगलों में बेहिसाब पिरूल पड़ा है, हल्की सी चिंगारी पूरे जंगल को राख कर दे रही है।