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तपती-जलती धूप, काफल खाओ खूब
Thu, 09 May 2019 06:50 PM IST
दीपक नेगी
almora
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Published by: दीपक नेगी
Updated Thu, 09 May 2019 06:50 PM IST
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लंबे समय से काफल का इंतजार कर रहे लोगों के लिए बाजार में काफल आ गया गया है। बृहस्पतिवार को अल्मोड़ा बाजार में काफल की पहली खेप पहुंची तो लोग काफल खरीदने उमड़ पड़े। अमूमन जंगली फल काफल चैत माह में ही पक जाता है, लेकिन इस बार काफल देर से आया। बारिश और ओलावृष्टि के कारण काफल की पैदावार काफी कम हुई है। शुरुआत है इसलिए काफल के दाम भी काफी बढ़े हुए हैं।
बाजार में काफल साढ़े तीन सौ रुपये किलो बिक रहा है। जबकि पिछले साल शुरुआत में इसका दाम 250 रुपये किलो था। लमगड़ा, शहरफाटक, जलना, अंडोली, जागेश्वर, धौलछीना आदि ठंडे इलाके में काफल की काफी पैदावार होती है। रोजगार का अच्छा जरिया होने के कारण ग्रामीण काफी मशक्कत के बाद इसे तोड़ते हैं और शहर में बेचने पहुंच जाते हैं। एक टोकरी को भरने में दो से तीन घंटे लग जाते हैं। सीजन में लमगड़ा के ग्रामीण काफल के कारोबार से अच्छी आय अर्जित कर लेते हैं। क्षेत्र में करीब 55-60 लोग काफल का कारोबार करते हैं।
अल्मोड़ा बस स्टेशन में काफल बेच रहे लमगड़ा निवासी कुंदन सिंह ने बताया कि काफल की डलिया में दस से 12 किलो काफल आ जाता है। उन्होंने बताया कि इस बार काफल काफी देर से आया और पैदावार भी काफी कम हुई है। उन्होंने बताया कि तड़के वह काफल तोड़ने जंगल चले गए थे टोकरी भरी तो वह बेचने अल्मोड़ा आ गए। दोपहर तक उसकी डलिया के आधे काफल बिक चुके थे। वहीं चौक बाजार में काफल बेच रहे लमगड़ा के जीवन चंद्र ने बताया कि उसके परिवार के चार पांच लोग पहले दिन काफल तोड़ने चले जाते हैं और शाम को वापस लौटते हैं। पिछले साल काफल का दाम शुरुआत में 250 रुपये किलो था। बाद में यह 140 रुपये किलो तक आ गया था।
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बाजार में काफल साढ़े तीन सौ रुपये किलो बिक रहा है। जबकि पिछले साल शुरुआत में इसका दाम 250 रुपये किलो था। लमगड़ा, शहरफाटक, जलना, अंडोली, जागेश्वर, धौलछीना आदि ठंडे इलाके में काफल की काफी पैदावार होती है। रोजगार का अच्छा जरिया होने के कारण ग्रामीण काफी मशक्कत के बाद इसे तोड़ते हैं और शहर में बेचने पहुंच जाते हैं। एक टोकरी को भरने में दो से तीन घंटे लग जाते हैं। सीजन में लमगड़ा के ग्रामीण काफल के कारोबार से अच्छी आय अर्जित कर लेते हैं। क्षेत्र में करीब 55-60 लोग काफल का कारोबार करते हैं।
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अल्मोड़ा बस स्टेशन में काफल बेच रहे लमगड़ा निवासी कुंदन सिंह ने बताया कि काफल की डलिया में दस से 12 किलो काफल आ जाता है। उन्होंने बताया कि इस बार काफल काफी देर से आया और पैदावार भी काफी कम हुई है। उन्होंने बताया कि तड़के वह काफल तोड़ने जंगल चले गए थे टोकरी भरी तो वह बेचने अल्मोड़ा आ गए। दोपहर तक उसकी डलिया के आधे काफल बिक चुके थे। वहीं चौक बाजार में काफल बेच रहे लमगड़ा के जीवन चंद्र ने बताया कि उसके परिवार के चार पांच लोग पहले दिन काफल तोड़ने चले जाते हैं और शाम को वापस लौटते हैं। पिछले साल काफल का दाम शुरुआत में 250 रुपये किलो था। बाद में यह 140 रुपये किलो तक आ गया था।
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