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परिकल्पना साकार करने के लिए उत्तराखंड में वैकल्पिक राजनीति जरूरी
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड में वैकल्पिक राजनीति की संभावना विषय पर आयोजित वेबिनार कार्यक्रम में वक्ताओं ने उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिये वैकल्पिक राजनीति को जरूरी बताया। कहा कि स्थानीय मुद्दों की संवेदनशीलता को समझते हुए ही आम लोगों के लिए नीतियां बनाई जा सकती हैं। देश के विभिन्न राज्यों में जिस तरह से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने वैकल्पिक राजनीति के क्षेत्र को भरा है, उत्तराखंड में भी इसी तरह की जरूरत है।
उक्रांद के ‘20 साल, कई सवाल’ वेबिनार कार्यक्रम पत्रकार और राज्य आंदोलनकारी चारु तिवारी ने आयोजित किया। वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य की मांग ही राजनीतिक विकल्प से उपजी थी। लेकिन इस क्षेत्र में खास प्रगति नहीं हो सकी। यही वजह है कि जो भी हिमालय विरोधी लोग हैं, उन्हें बार-बार सत्ता मिल रही है।
देश में भी क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल पर लोग अपने क्षेत्रीय दलों को स्थापित करते रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड राज्य की स्थापना के बाद भी राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां अपना स्थान नहीं बना पाई हैं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक योगेश भट्ट ने कहा कि राज्य बनने के 20 साल बाद भी हमें इस विषय पर बात करनी पड़ रही है कि राज्य में वैकल्पिक अथवा हमारे बीच के लोगों के लिए राजनीति है भी या नहीं।
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वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल ने कहा कि क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल को उठाने वाला उक्रांद का राजनीति और राज्यों की क्षेत्रीय ताकतों के मुकाबले प्रभावी न होना चिंता का विषय है। उक्रांद के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने कहा कि हमने हमेशा राज्य के तमाम सवालों को हर मंच से उठाने की कोशिश की। कुछ आरोप भी हैं कि हमने भाजपा-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया।
उक्रांद नेता और पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि यह ठीक बात है कि जनता के कई बार भाजपा-कांग्रेस से निजात पाने के आक्रोश को हम हकीकत में नहीं बदल पाए। यहीं से हमारी चुनौती शुरू होती है। युवा पत्रकार और विश्लेषक राहुल कोटियाल ने भी विचार रखे।
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उक्रांद के ‘20 साल, कई सवाल’ वेबिनार कार्यक्रम पत्रकार और राज्य आंदोलनकारी चारु तिवारी ने आयोजित किया। वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य की मांग ही राजनीतिक विकल्प से उपजी थी। लेकिन इस क्षेत्र में खास प्रगति नहीं हो सकी। यही वजह है कि जो भी हिमालय विरोधी लोग हैं, उन्हें बार-बार सत्ता मिल रही है।
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देश में भी क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल पर लोग अपने क्षेत्रीय दलों को स्थापित करते रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड राज्य की स्थापना के बाद भी राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां अपना स्थान नहीं बना पाई हैं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक योगेश भट्ट ने कहा कि राज्य बनने के 20 साल बाद भी हमें इस विषय पर बात करनी पड़ रही है कि राज्य में वैकल्पिक अथवा हमारे बीच के लोगों के लिए राजनीति है भी या नहीं।
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वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल ने कहा कि क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल को उठाने वाला उक्रांद का राजनीति और राज्यों की क्षेत्रीय ताकतों के मुकाबले प्रभावी न होना चिंता का विषय है। उक्रांद के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने कहा कि हमने हमेशा राज्य के तमाम सवालों को हर मंच से उठाने की कोशिश की। कुछ आरोप भी हैं कि हमने भाजपा-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया।
उक्रांद नेता और पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि यह ठीक बात है कि जनता के कई बार भाजपा-कांग्रेस से निजात पाने के आक्रोश को हम हकीकत में नहीं बदल पाए। यहीं से हमारी चुनौती शुरू होती है। युवा पत्रकार और विश्लेषक राहुल कोटियाल ने भी विचार रखे।