सिंचाई सुविधा न मिलने पर छोड़ दी खेती
पहाड़ में आर्थिकी की रीढ़ समझी जाने वाली खेती-किसानी अब बदहाली के दौर से गुजर रही है। सुअर, बंदरों के साथ ही किसान अब संबंधित विभागों की उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।
रानीखेत उपमंडल क्षेत्र में बासुलीसेरा, दुगौड़ा, छाना सहित कई गूल नहरें लंबे समय से बंद पड़ी हैं, लेकिन विभागीय अफसर इनकी मरम्मत तक नहीं करा पा रहे हैं। सिंचाई के अभाव में काश्तकारों ने अब खेती छोड़ दी है। जबकि इस क्षेत्र में धान, गेहूं और दालों का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है।
मल्यालनदी से बनी लघु सिंचाई विभाग की तयासेरा-दुगौड़ा सिंचाई नहर 2008 में चौकुनी-दुगौड़ा मोटर मार्ग निर्माण के दौरान मलबा गिरने से बंद हो गई थी। यह नहर क्षेत्र के 250 मवासों की लगभग 15 सौ नाली जमीन को सिंचाई सुविधा मुहैया कराती थी। इन सेरों में धान और गेहूं का प्रचुर उत्पादन होता था।
ग्रामीण साल भर खाने के अलावा अनाज बेचकर आजीविका भी चलाते थे। पूर्व जिला पंचायत सदस्य राजेंद्र बिष्ट और पूर्व प्रधान भोला सिंह ने कहा कि चौकुनी-दुगौड़ा मोटर मार्ग की सर्वे के दौरान ना ही ध्यान ग्रामीणों ने दिया और ना ही विभागों ने। नहर मलबे से पटी है और कई हिस्सा कट भी चुका है।
सिंचाई के अभाव में काश्तकारों ने कई सेरे बंजर छोड़ दिए हैं और बाजार से महंगा राशन खरीद रहे हैं। बासुलीसेरा-दुगौड़ा नहर का भी कमोबेश यही हाल है। यह नहर गगास नदी से बनी है। इससे बाटकोटली, दुगौड़ा, नौसार और च्याली के ग्रामीणों की 500 नाली भूमि सिंचित होती थी।
नहर क्षतिग्रस्त होने से सिंचाई सुविधा पूरी तरह से ठप पड़ी है। काश्तकार तलाऊं की जगह उपराऊ वाली भूमि में गेहूं बो रहे हैं, जिसका नुकसान हो रहा है। धान का उत्पादन चौपट हो चुका है।
ग्रामीणों द्वारा कई बार मरम्मत की गुहार लगाई जा चुकी है लेकिन सिंचाई और लधु सिंचाई विभाग इस संबंध में कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। ग्रामीणों ने कहा कि यदि नहरें ठीक नहीं हुई तो आंदोलन होगा।