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तिमले के पात में खाने का स्वाद अब नहीं मिलता
Almora
Updated Thu, 21 Nov 2013 05:45 AM IST
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चौखुटिया। जमाने के बदलते मिजाज के साथ ही शादी का रंग और ढंग बदल गया है। हाईफाई टेंट, स्टेंडिंग खाना और व्यंजनों की बढ़ती संख्या ने विवाह को खर्चीला तो बनाया परंतु स्वागत सत्कार में पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही। बारात में तिमली के पात में परोसे जाने वाला हलुवा पूरी अब गायब है।
कुछ साल पहले तक शादी समारोह के दौरान शादी वाले घर ही नहीं बल्कि पूरे गांव में उत्साह जैसा माहौल रहता था। लाल रंग के कपडे़ (लाल टूल) में रुई से स्वागतम् लिखा जाता था। केले के पेड़ों को दोनों तरफ खड़ा कर गेट बनाया जाता था। बच्चे रंग बिरंगे पतंगी कागज चिपकाने में व्यस्त रहते थे। स्वागत सत्कार के बाद बारातियों को पंक्तिबद्ध बैठाकर तिमली (अंजीर) अथवा केले के पत्ते में खाना परोसा जाता था। बाराती हलुवा पूरी, अमचूर का अचार, गडेरी और कद्दू की सब्जी बडे़ चाव से खाते थे। दूध दही प्रचुर मात्रा में मिलता था इसलिए मूली का रायता, दही और खीर भी बनाई जाती थी। खीड़ा के हयात सिंह, पालंगबाड़ी के माधोसिंह और बसभीड़ा के चंदन सिंह बताते हैं कि तिमली के पात में खाने का स्वाद और पहले जैसा आत्मीयता भरा स्वागत सत्कार अब दुर्लभ हो गया है।
अब तो दुल्हन भी नाचने लगी
चौखुटिया। नई नवेली दुल्हन मायके से विदाई के गम में डूबी घूंघट डाले चुपचाप बैठी रहती थी। उसे ससुराल के नए माहौल में बुरा न लगे इसके लिए भाई भी साथ में आता था परंतु अब अपवादों को छोड़ दुल्हन भी अन्य महिलाओं के साथ नाचती दिखती है। लाउडस्पीकर की जगह डीजे के शोर, नगाडे़ निशाणें की जगह बैंड और छोलिया की जगह ढोल ने ले ली है।
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कुछ साल पहले तक शादी समारोह के दौरान शादी वाले घर ही नहीं बल्कि पूरे गांव में उत्साह जैसा माहौल रहता था। लाल रंग के कपडे़ (लाल टूल) में रुई से स्वागतम् लिखा जाता था। केले के पेड़ों को दोनों तरफ खड़ा कर गेट बनाया जाता था। बच्चे रंग बिरंगे पतंगी कागज चिपकाने में व्यस्त रहते थे। स्वागत सत्कार के बाद बारातियों को पंक्तिबद्ध बैठाकर तिमली (अंजीर) अथवा केले के पत्ते में खाना परोसा जाता था। बाराती हलुवा पूरी, अमचूर का अचार, गडेरी और कद्दू की सब्जी बडे़ चाव से खाते थे। दूध दही प्रचुर मात्रा में मिलता था इसलिए मूली का रायता, दही और खीर भी बनाई जाती थी। खीड़ा के हयात सिंह, पालंगबाड़ी के माधोसिंह और बसभीड़ा के चंदन सिंह बताते हैं कि तिमली के पात में खाने का स्वाद और पहले जैसा आत्मीयता भरा स्वागत सत्कार अब दुर्लभ हो गया है।
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अब तो दुल्हन भी नाचने लगी
चौखुटिया। नई नवेली दुल्हन मायके से विदाई के गम में डूबी घूंघट डाले चुपचाप बैठी रहती थी। उसे ससुराल के नए माहौल में बुरा न लगे इसके लिए भाई भी साथ में आता था परंतु अब अपवादों को छोड़ दुल्हन भी अन्य महिलाओं के साथ नाचती दिखती है। लाउडस्पीकर की जगह डीजे के शोर, नगाडे़ निशाणें की जगह बैंड और छोलिया की जगह ढोल ने ले ली है।
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