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अंग्रेजों के समय का कुमाऊं का एकमात्र लेप्रोसी मिशन आर्थिक संकट में

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Fri, 25 Jan 2019 11:26 PM IST
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अंग्रेजों के समय का कुमाऊं का एकमात्र लेप्रोसी मिशन आर्थिक संकट में

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अल्मोड़ा। अंग्रेजों के समय का कुमाऊं का एकमात्र लेप्रोसी मिशन आज बदतर हालात में पहुंच चुका है। किसी भी तरह का अनुदान नहीं मिलने के कारण यहां इलाज के लिए रह रहे कुष्ठ रोगियों को खाने के लाले पड़ गए हैं। कुष्ठ रोगियों की सेवा में लगे कर्मचारियों को भी पिछले दो माह से वेतन नहीं मिला है। केंद्र और राज्य सरकार से तो मदद मिलती नहीं है, लेकिन मिशन को पिछले आठ सालों से किसी तरह चंदे से चलाया जा रहा था। अब चंदा भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थिति अगर ज्यादा दिन रही तो लेप्रोसी मिशन बंद होने में देर नहीं लगेगी।

ब्रिटिशकाल के दौरान तक्कालीन कुमाऊं कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे ने अल्मोड़ा के करबला में 1854 में लेप्रोसी अस्पताल बनवाया था। यहां विभिन्न जनपदों से इलाज के लिए कुष्ठ रोगियों को रखा जाता रहा है। तब से लेकर आज तक हजारों विभिन्न जिलों के कुष्ठ रोगियों को यहां से नया जीवन मिल चुका है। सबसे बड़ी बात यह कि लेप्रोसी मिशन में भर्ती होने वाले कुष्ठ रोगियों को भीख मांगने के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ा। पूर्व में मिशनरीज और विदेशी संस्थाओं के अलावा अन्य स्थानीय संस्थाओं से किसी प्रकार मदद लेकर लेप्रोसी मिशन को सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था, लेकिन 2010 से लेप्रोसी मिशन में दिक्कतें खड़ी हो गईं। लेप्रोसी मिशन में आठ कर्मचारियों के अलावा 24 कुष्ठ रोगी रहते हैं। कुष्ठरोगियों की दवा, भोजन, बिजली, पानी, वाहन और कर्मचारियों के वेतन आदि में हर माह ढाई लाख रुपये खर्च आता है।
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हालत यह है कि यहां के कर्मचारियों को भी पिछले दो माह से वेतन नहीं मिला है। ऐसी स्थिति में कुष्ठ आश्रम चलना मुश्किल हो गया है। वर्तमान में तो लेप्रोसी मिशन में फर्नीचर और बल्ब बदलने के लिए भी पैसा नहीं है। इन दिनों लेप्रोसी मिशन के कर्मचारी कार्यालयों, दुकानों में जा जाकर चंदा मांगने को मजबूर हो गए हैं।
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कोट-
लेप्रोसी मिशन की स्थिति काफी खराब है। सरकार से कोई अनुदान नहीं मिलता है। पूर्व में लोगों ने काफी सहयोग किया था लेकिन अब डोनेशन नहीं मिलने से स्थिति और खराब हो गई है। राज्य सरकार को पत्र लिखकर अनुदान देने की मांग की गई है। -आनंद सिंह, लेप्रोसी मिशन प्रभारी
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