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पहाड़ में गांधी आश्रमों की हो रही उपेक्षा
Updated Fri, 23 Jun 2017 11:12 PM IST
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पहाड़ में गांधी आश्रमों की अनदेखी
अल्मोड़ा। स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ाने और स्वदेशी वस्त्र बनाकर देश को स्वावलंबी बनाने के लिए महात्मा गांधी के प्रयास से खुले गांधी आश्रमों की अनदेखी हो रही है। इनकी हालत सुधारने के लिए सरकार ध्यान नहीं दे रही है। पहाड़ के चार जिलों के क्षेत्रीय उत्पादन केंद्र मुख्यालय चनौदा को ढाई साल से उत्तराखंड सरकार की ओर दी जाने वाली छूट नहीं मिल पाई है। नतीजतन कच्चे माल का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। एक साल में उत्पादन घटकर 75 लाख पहुंच गया है। इससे कर्मचारियों, बुनकरों के रोजगार पर भी मार पड़ रही है।
आजादी की लड़ाई के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक की नौबत आ पड़ी थी। तब महात्मा गांधी ने स्वदेशी कपड़ा पहनने का आह्वान किया। महात्मा गांधी ने खुद चरखा चलाकर स्वदेशी वस्त्रों के माध्यम से स्वरोजगार अपनाने की सलाह दी थी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 1929 में महात्मा गांधी ने सोमेश्वर के चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना भी की थी। उसके बाद पर्वतीय क्षेत्र के हजारों बुनकर इस कारोबार में जुड़ने लगे लेकिन इधर करीब ढाई साल से गांधी आश्रम के लिए प्रदेश सरकार की ओर छूट नहीं मिल सकी है। इससे खादी आश्रम कच्चा माल नहीं खरीद पा रहा हैं। बुनकरों के रोजगार पर भी मार पड़ने लगी है, क्योंकि छूट मिलने पर ही गांधी आश्रम कच्चा माल खरीदता है। कताई, बुनाई के लिए ग्रामीणों को ऑर्डर दिया जाता है। गांधी आश्रम अल्मोड़ा के प्रबंधक प्रमोद वर्मा ने बताया कि 10 प्रतिशत छूट नहीं मिली है। सरकारी अनुदान भी मिलना बंद हो गया है।
टोपी से लेकर थुलमा तक बनता है
अल्मोड़ा। वर्तमान में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर चारों जिलों में 100 कर्मचारी और 400 बुनकर इस कारोबार में लगे हैं। गांधी आश्रमों से मिले कच्चे माल से बुनकर स्वेटर, चादर, शॉल, पंखी, टोपी, मफलर, ट्वीट के थान, थुलमा, चुटका समेत कई सामान तैयार कर रहे हैं। तैयार माल उत्तराखंड के अलावा बाहरी राज्यों में भी बिकता है।
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कुमाऊं में खादी का पिछले साल तक उत्पादन एक करोड़ दो लाख रुपये था जो इस साल घटकर 74 लाख 99 हजार ही रह गया है। पिछले साल 5 करोड़ 14 लाख की बिक्री हुई थी जो इस बार 4 करोड़ 70 लाख में ही निपट गया है।
- हरीश चंद्र पांडे, चनौदा के अकाउंटेंट, क्षेत्रीय मुख्यालय।
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अल्मोड़ा। स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ाने और स्वदेशी वस्त्र बनाकर देश को स्वावलंबी बनाने के लिए महात्मा गांधी के प्रयास से खुले गांधी आश्रमों की अनदेखी हो रही है। इनकी हालत सुधारने के लिए सरकार ध्यान नहीं दे रही है। पहाड़ के चार जिलों के क्षेत्रीय उत्पादन केंद्र मुख्यालय चनौदा को ढाई साल से उत्तराखंड सरकार की ओर दी जाने वाली छूट नहीं मिल पाई है। नतीजतन कच्चे माल का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। एक साल में उत्पादन घटकर 75 लाख पहुंच गया है। इससे कर्मचारियों, बुनकरों के रोजगार पर भी मार पड़ रही है।
आजादी की लड़ाई के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक की नौबत आ पड़ी थी। तब महात्मा गांधी ने स्वदेशी कपड़ा पहनने का आह्वान किया। महात्मा गांधी ने खुद चरखा चलाकर स्वदेशी वस्त्रों के माध्यम से स्वरोजगार अपनाने की सलाह दी थी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 1929 में महात्मा गांधी ने सोमेश्वर के चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना भी की थी। उसके बाद पर्वतीय क्षेत्र के हजारों बुनकर इस कारोबार में जुड़ने लगे लेकिन इधर करीब ढाई साल से गांधी आश्रम के लिए प्रदेश सरकार की ओर छूट नहीं मिल सकी है। इससे खादी आश्रम कच्चा माल नहीं खरीद पा रहा हैं। बुनकरों के रोजगार पर भी मार पड़ने लगी है, क्योंकि छूट मिलने पर ही गांधी आश्रम कच्चा माल खरीदता है। कताई, बुनाई के लिए ग्रामीणों को ऑर्डर दिया जाता है। गांधी आश्रम अल्मोड़ा के प्रबंधक प्रमोद वर्मा ने बताया कि 10 प्रतिशत छूट नहीं मिली है। सरकारी अनुदान भी मिलना बंद हो गया है।
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टोपी से लेकर थुलमा तक बनता है
अल्मोड़ा। वर्तमान में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर चारों जिलों में 100 कर्मचारी और 400 बुनकर इस कारोबार में लगे हैं। गांधी आश्रमों से मिले कच्चे माल से बुनकर स्वेटर, चादर, शॉल, पंखी, टोपी, मफलर, ट्वीट के थान, थुलमा, चुटका समेत कई सामान तैयार कर रहे हैं। तैयार माल उत्तराखंड के अलावा बाहरी राज्यों में भी बिकता है।
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कुमाऊं में खादी का पिछले साल तक उत्पादन एक करोड़ दो लाख रुपये था जो इस साल घटकर 74 लाख 99 हजार ही रह गया है। पिछले साल 5 करोड़ 14 लाख की बिक्री हुई थी जो इस बार 4 करोड़ 70 लाख में ही निपट गया है।
- हरीश चंद्र पांडे, चनौदा के अकाउंटेंट, क्षेत्रीय मुख्यालय।