फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Almora News ›   धरती के भीतर पानी भेजना है तो चीड़ को फैलने से रोकना जरूरी

धरती के भीतर पानी भेजना है तो चीड़ को फैलने से रोकना जरूरी

Mon, 14 May 2018 11:32 PM IST
Updated Mon, 14 May 2018 11:32 PM IST
विज्ञापन
धरती के भीतर पानी भेजना है तो चीड़ को फैलने से रोकना जरूरी
डीडीहाट में चौबाटी के पास काटे गए चीड़ के पेड़ - फोटो : अमर उजाला
अल्मोड़ा। पहाड़ में बांज और अन्य चौड़ी पत्ती के वनों की जगह चीड़ के वन तेजी से फैल रहे हैं। हालांकि वन विभाग ने पिछले कई सालों से चीड़ के पौध लगाने बंद कर दिए हैं, लेकिन चीड़ खुद-ब-खुद तेजी से फैल रहा है जबकि चौड़ी पत्ती वाले वन सिकुड़ रहे हैं। चीड़ के जंगलों में बारिश का पानी धरती के भीतर काफी कम मात्रा में जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक बांज के वनों में बारिश का 23 प्रतिशत पानी धरती के भीतर जाता है, लेकिन चीड़ के वनों में सिर्फ आठ प्रतिशत पानी ही भीतर जाता है और ज्यादातर पानी बहकर निकल जाता है। इस स्थिति को जल संरक्षण के लिहाज से बहुत खराब माना जा रहा है।
विज्ञापन

जल स्रोतों और नदियों में बहने वाले पानी का स्तर मुख्य तौर पर बारिश के जल के रिचार्ज पर निर्भर करता है। बारिश का जो भी पानी धरती के भीतर जाता है वही बाद में जल स्रोतों, नौलों और गधेरों से बाहर निकलता है। रिचार्ज की इसी प्रक्रिया पर नदियों का भविष्य भी टिका है, लेकिन हाल के वर्षों में पहाड़ में धरती के भीतर के जल भंडारों में पानी का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। पिछले कुछ दशकों में बांज और अन्य चौड़ी पत्ती के वन सिकुड़ रहे हैं जबकि चीड़ के वनों का विस्तार तेजी से हो रहा है। वन विभाग ने पिछले कई सालों से चीड़ के पौध लगाने बंद कर दिए हैं, लेकिन इसके बावजूद चीड़ के जंगल तेजी से फैल रहे हैं। वन विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक सिविल सोयम वन प्रभाग अल्मोड़ा का आकलन करें तो यहां में ही 81.43 प्रतिशत चीड़ के वन हैं। जबकि सिर्फ 2.04 प्रतिशत में बांज और 1.34 प्रतिशत क्षेत्र में देवदार के वन हैं। पहाड़ में कमोवेश यही स्थिति अन्य जगह भी है।
विज्ञापन

बांज और अन्य चौड़ी पत्ती के वनों में पानी का रिचार्ज अपेक्षाकृत काफी अच्छा होता है। कुमाऊं विवि एसएसजे परिसर में भूगोल विभागाध्यक्ष और एनआरडीएमएस केंद्र के निदेशक प्रो.जेएस रावत मुताबिक बांज के जंगल में ताजी पत्तियों से लेकर सड़ी-गली पत्तियों की 50 सेमी से लेकर एक मीटर तक मोटी परत जम जाती है। ह्यूमस कही जानी वाली यह परत बारिश के पानी को तेजी से सोखती है। यही वजह है कि बांज के वनों में बारिश का 23 प्रतिशत पानी धरती के भीतर जाता है। जबकि चीड़ के वन क्षेत्रों में ह्यूमस की कोई परत नहीं होती और बारिश का अधिकांश पानी बहकर सीधे निकल जाता है। प्रो. रावत के मुताबिक चीड़ के वनों में बारिश के पानी का रिचार्ज सिर्फ आठ प्रतिशत ही होता है। दूसरी तरफ बंजर भूमि में जहां चीड़ के पेड़ भी नहीं हैं वहां सिर्फ पांच प्रतिशत पानी ही रिचार्ज होता है। प्रो. रावत ने चीड़ के वनों में सुधार के लिए सबसे पहले वहां खाली भूमि में नेपियर घास के साथ ही घिंघारु, हिसालु, किल्मोड़ा आदि का रोपण करने और साथ ही वहां धीरे-धीरे चौड़ी पत्ती वाले बांज, बुरांश, काफल आदि प्रजाति के पौध लगाने पर जोर दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


पहाड़ में खुद-ब-खुद फैल रहे हैं चीड़ के वन
चौड़ी पत्ती के वनों का सिकुड़ना चिंताजनक
चौड़ी पत्ती वाले वनों में बारिश का 23 प्रतिशत पानी भीतर जाता है जबकि चीड़ के वनों में सिर्फ आठ प्रतिशत

कोसी पुनर्जनन योजना में वनों के अपग्रेडेशन पर जोर
अल्मोड़ा। प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में शुरू की गई कोसी पुनर्जनन योजना के तहत प्रस्तावित कार्य योजना में कोसी जल संग्रहण क्षेत्र में चीड़ के वनों में नेपियर घास लगाने के साथ ही झाड़ियों वाले घिंघारु, हिसालु, किल्मोड़ा आदि को प्राथमिकता दी जाएगी। कोसी पुनर्जनन के लिए बनी समिति के सदस्य प्रो.जेएस रावत ने बताया कि कार्ययोजना में चीड़ के वनों को अपग्रेड करने के लिए चौड़ी पत्ती प्रजाति के पौध भी लगाने पर जोर दिया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed