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17.39 करोड़ से होगा कोसी नदी का पुनर्जनन कार्य
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा।
Updated Thu, 11 Jan 2018 09:58 PM IST
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कार्यशाला को संबोधित करती जिलाधिकारी इवा आशीष श्रीवास्तव। (
- फोटो : अमर उजाला
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कोसी नदी पुनर्जनन अभियान को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन ने कवायद शुरू कर दी है। कोसी कैचमेंट एरिया को 14 रिचार्ज जोनों में बांटा गया है और इसके लिए 14 नोडल अधिकारी नामित किए गए हैं। कोसी नदी पुनर्जनन के लिए 17.39 करोड़ की डीपीआर बनाई गई है। इस धनराशि से जंगलों में पारंपरिक फलदार पौधों का रोपण, चहारदीवारी, तारबाड़, चाल-खाल बनाए जाएंगे। जिलाधिकारी और अभियान समिति की अध्यक्ष ईवा आशीष श्रीवास्तव ने विकास भवन में हुई कोसी नदी पुनर्जनन और स्वच्छता जागरूकता अभियान कार्यशाला में यह जानकारी दी।
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डीएम ने कहा कि कोसी नदी अल्मोड़ा की जीवन रेखा है। नदी के पुनर्जनन कार्य के लिए आम लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। उन्होंने बताया कि अभियान के लिए जलागम विभाग के 14 नोडल अधिकारियों की नियुक्ति समन्वयक पर्यवेक्षक के तौर पर की गई है। प्रो. जेएस रावत ने पावर प्वाइंट के माध्यम से कोसी नदी की वर्तमान दशा और पुनर्जनन कार्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गत 12 दिसंबर को अल्मोड़ा आए प्रदेश के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने कोसी नदी कैचमेंट एरिया क्षेत्र में आने वाले 14 स्थानों की विस्तृत डीपीआर बनाने के निर्देश दिए थे। जीबी पंत पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिक डा. डीएस रावत ने कहा कि संस्थान कोसी नदी पुनर्जनन कार्य में पूर्ण सहयोग करेगा।
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मुख्य विकास अधिकारी मयूर दीक्षित ने कहा कि मनरेगा के माध्यम से कोसी पुनर्जनन के लिए कार्य किया जाएगा। अभियान को सफल बनाने के लिए नामित विभागों, पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयं सेवी संस्थाओं, मंगल दलों, विकासखंड हवालबाग और ताकुला के कार्मिकों का विशेष सहयोग लिया जाएगा। संचालन जिला विकास अधिकारी मो. असलम ने किया। प्रभागीय वनाधिकारी पंकज कुमार, जिला पंचायत राज अधिकारी जितेंद्र कुमार ने भी सुझाव रखे। कार्यशाला में परियोजना निदेशक ग्राम्य विकास नरेश कुमार, बीडीओ हवालबाग पंकज कांडपाल, ताकुला के मोहन सिंह बिष्ट आदि कार्मिक उपस्थित थे।
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समन्वय बनाकर यह विभाग करेंगे काम
कोसी पुनर्जनन अभियान में ग्राम्य विकास, पंचायती राज, वन विभाग, सिंचाई, जल निगम, जल संस्थान, उद्यान, कृषि विभाग आपस में समन्वय बनाकर काम करेंगे। साथ ही हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान और विवेकानंद कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक तकनीकी सहयोग और अनुभवों का लाभ देंगे।