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कुष्ठ रोगियों की मदद के लिए हाथ तो बढ़ाओ....
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अल्मोड़ा। अंग्रेजों के समय का कुमाऊं का एकमात्र लेप्रोसी मिशन काफी समय से पैसे की तंगी से जूझ रहा है। अनुदान नहीं मिलने कारण यहां इलाज के लिए रह रहे कुष्ठ रोगियों को खाने के लाले पड़ गए हैं। कुष्ठ रोगियों की सेवा में लगे कर्मचारियों को भी पिछले दो माह से वेतन नहीं मिला था बमुश्किल बरेली के एक ट्रस्ट ने एक माह के लिए कुछ धनराशि दी, लेकिन अब फिर वही समस्या सामने आ गई है।
ब्रिटिशकाल के दौरान तक्कालीन कुमाऊं कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे ने अल्मोड़ा के करबला में 1854 में लेप्रोसी अस्पताल बनवाया था। यहां विभिन्न जिलों से इलाज के लिए कुष्ठ रोगियों को रखा जाता रहा है। तब से लेकर आज तक हजारों विभिन्न जिलों के कुष्ठ रोगियों को यहां से नया जीवन मिल चुका है। सबसे बड़ी बात यह कि लेप्रोसी मिशन में भर्ती होने वाले कुष्ठ रोगियों को फिर कभी भीख मांगने के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ा।
पूर्व में मिशनरीज और विदेशी संस्थाओं के अलावा अन्य स्थानीय संस्थाओं से किसी प्रकार मदद लेकर लेप्रोसी मिशन को सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था, लेकिन 2010 से लेप्रोसी मिशन में दिक्कतें खड़ी हो गईं। मालूम हो सरकार से किसी भी तरह की मदद नहीं मिलने के बाद बीते आठ सालों से लेप्रोसी मिशन को किसी तरह चंदे की मदद से चलाया जा रहा है, अब चंदा भी नहीं मिल पा रहा है।
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वर्तमान में लेप्रोसी मिशन में आठ कर्मचारी और 24 कुष्ठ रोगी रहते हैं। कुष्ठरोगियों की दवा, भोजन, बिजली, पानी, वाहन और कर्मचारियों के वेतन आदि में हर माह ढाई लाख रुपये खर्च आता है। लेप्रोसी मिशन के प्रबंधक आनंद सिंह ने बताया कि कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए पैसा नहीं था और कर्मचारियों को भी दो माह से वेतन नहीं मिल रहा था। बरेली के एक ट्रस्ट ने तीन लाख रुपये की मदद दी जिससे मार्च महीना कट गया। अब अप्रैल में फिर वही समस्या आ खड़ी हुई है।
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ब्रिटिशकाल के दौरान तक्कालीन कुमाऊं कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे ने अल्मोड़ा के करबला में 1854 में लेप्रोसी अस्पताल बनवाया था। यहां विभिन्न जिलों से इलाज के लिए कुष्ठ रोगियों को रखा जाता रहा है। तब से लेकर आज तक हजारों विभिन्न जिलों के कुष्ठ रोगियों को यहां से नया जीवन मिल चुका है। सबसे बड़ी बात यह कि लेप्रोसी मिशन में भर्ती होने वाले कुष्ठ रोगियों को फिर कभी भीख मांगने के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ा।
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पूर्व में मिशनरीज और विदेशी संस्थाओं के अलावा अन्य स्थानीय संस्थाओं से किसी प्रकार मदद लेकर लेप्रोसी मिशन को सफलता पूर्वक चलाया जा रहा था, लेकिन 2010 से लेप्रोसी मिशन में दिक्कतें खड़ी हो गईं। मालूम हो सरकार से किसी भी तरह की मदद नहीं मिलने के बाद बीते आठ सालों से लेप्रोसी मिशन को किसी तरह चंदे की मदद से चलाया जा रहा है, अब चंदा भी नहीं मिल पा रहा है।
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वर्तमान में लेप्रोसी मिशन में आठ कर्मचारी और 24 कुष्ठ रोगी रहते हैं। कुष्ठरोगियों की दवा, भोजन, बिजली, पानी, वाहन और कर्मचारियों के वेतन आदि में हर माह ढाई लाख रुपये खर्च आता है। लेप्रोसी मिशन के प्रबंधक आनंद सिंह ने बताया कि कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए पैसा नहीं था और कर्मचारियों को भी दो माह से वेतन नहीं मिल रहा था। बरेली के एक ट्रस्ट ने तीन लाख रुपये की मदद दी जिससे मार्च महीना कट गया। अब अप्रैल में फिर वही समस्या आ खड़ी हुई है।