{"_id":"5ace18284f1c1b4c3e8b486f","slug":"121523456040-almora-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कत्यूरकालीन अल्मोड़ा की सबसे बड़ी सुरंग को नहीं मिला संरक्षण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कत्यूरकालीन अल्मोड़ा की सबसे बड़ी सुरंग को नहीं मिला संरक्षण
Updated Wed, 11 Apr 2018 10:58 PM IST
विज्ञापन
सुरंग से बाहर निकलते लोग।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कत्यूरकालीन सुरंग की कोई नहीं ले रहा सुध
देखरेख की जाए तो पर्यटन के लिए हो सकती है महत्वपूर्ण
सुरंग के सात मुहानों में से दो बंद
देहरादून सर्वेक्षण विभाग को पत्र भी भेजा पर नहीं ले रहा रुचि
अमित उप्रेती
अल्मोड़ा। सामरिक और पर्यटन की दृष्टि से पंत्यूड़ा गांव के राजकोट की सुरंग को जिले की सबसे महत्वपूर्ण और पुरातात्विक महत्व की सुरंग माना जाता है। जिसे स्थानीय लोग ओपी (आपरेशन एंड पेट्रोलिंग) नाम से जानते हैं। कत्यूरकालीन यह सुरंग 150 से 200 मीटर लंबी है। जिसमें सात मुहाने बने हैं। कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने इस सुरंग को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने और संरक्षित करने के लिए भारत सरकार के देहरादून स्थित सर्वेक्षण विभाग को पत्र भी भेजा था, लेकिन आज तक सुरंग के मामले में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। देखरेख के अभाव में अब सुरंग के दो मुहाने बंद हो गए हैं।
कत्यूरकालीन एतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की यह सुरंग अल्मोड़ा से करीब 18 किमी दूर कोसी-सोमेश्वर मार्ग पर दो स्थानीय नदियों के संगम तट पर बनी है। लोगों का कहना है कि कुमाऊं में अंग्रेजों के शासन में इस सुरंग का व्यापक इस्तेमाल हुआ। ऊंची चट्टान में बनी इस सुरंग से कई गांव एक साथ दिखाई देते हैं। पहाड़ी के अंदर चट्टान को तराशकर तैयार की गई इस सुरंग के बारे में पुरातत्व विभाग का मानना है कि यह सुरंग तब शायद दुश्मनों पर नजर रखने के लिए बनाई गई थी। सुरंग में आक्सीजन, रोशनी जाने और दुश्मनों पर नजर रखने के लिए सात मुहाने बने हैं। प्रत्येक मुहाने में 15 से 18 सीढ़ियां बनी हैं। सुरंग के अंदर बनी सीढ़ियां काफी चौड़ी हैं। सुरंग का एक मुहाना दो साल पूर्व स्थानीय लोगों द्वारा पत्थर निकालने के कारण बंद हो गया था। देखरेख के अभाव में सुरंग का दूसरा मुहाना भी बंद हो गया है। ।
कोट-
सुरंग का सर्वे कर इसके संरक्षण के लिए अधीक्षण पुरातत्वविद भारतीय सर्वेक्षण विभाग देहरादून को पूर्व में जानकारी दे दी गई थी। वर्तमान में इसके संरक्षण के लिए कोई आदेश नहीं आया है।
विज्ञापन
डॉ. चंद्र सिंह चौहान, प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, अल्मोड़ा।
-----------------
फोटो-11 एएलएम 01पी और 02पी
विज्ञापन
देखरेख की जाए तो पर्यटन के लिए हो सकती है महत्वपूर्ण
सुरंग के सात मुहानों में से दो बंद
देहरादून सर्वेक्षण विभाग को पत्र भी भेजा पर नहीं ले रहा रुचि
अमित उप्रेती
अल्मोड़ा। सामरिक और पर्यटन की दृष्टि से पंत्यूड़ा गांव के राजकोट की सुरंग को जिले की सबसे महत्वपूर्ण और पुरातात्विक महत्व की सुरंग माना जाता है। जिसे स्थानीय लोग ओपी (आपरेशन एंड पेट्रोलिंग) नाम से जानते हैं। कत्यूरकालीन यह सुरंग 150 से 200 मीटर लंबी है। जिसमें सात मुहाने बने हैं। कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने इस सुरंग को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने और संरक्षित करने के लिए भारत सरकार के देहरादून स्थित सर्वेक्षण विभाग को पत्र भी भेजा था, लेकिन आज तक सुरंग के मामले में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। देखरेख के अभाव में अब सुरंग के दो मुहाने बंद हो गए हैं।
कत्यूरकालीन एतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की यह सुरंग अल्मोड़ा से करीब 18 किमी दूर कोसी-सोमेश्वर मार्ग पर दो स्थानीय नदियों के संगम तट पर बनी है। लोगों का कहना है कि कुमाऊं में अंग्रेजों के शासन में इस सुरंग का व्यापक इस्तेमाल हुआ। ऊंची चट्टान में बनी इस सुरंग से कई गांव एक साथ दिखाई देते हैं। पहाड़ी के अंदर चट्टान को तराशकर तैयार की गई इस सुरंग के बारे में पुरातत्व विभाग का मानना है कि यह सुरंग तब शायद दुश्मनों पर नजर रखने के लिए बनाई गई थी। सुरंग में आक्सीजन, रोशनी जाने और दुश्मनों पर नजर रखने के लिए सात मुहाने बने हैं। प्रत्येक मुहाने में 15 से 18 सीढ़ियां बनी हैं। सुरंग के अंदर बनी सीढ़ियां काफी चौड़ी हैं। सुरंग का एक मुहाना दो साल पूर्व स्थानीय लोगों द्वारा पत्थर निकालने के कारण बंद हो गया था। देखरेख के अभाव में सुरंग का दूसरा मुहाना भी बंद हो गया है। ।
विज्ञापन
कोट-
सुरंग का सर्वे कर इसके संरक्षण के लिए अधीक्षण पुरातत्वविद भारतीय सर्वेक्षण विभाग देहरादून को पूर्व में जानकारी दे दी गई थी। वर्तमान में इसके संरक्षण के लिए कोई आदेश नहीं आया है।
विज्ञापन
डॉ. चंद्र सिंह चौहान, प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, अल्मोड़ा।
-----------------
फोटो-11 एएलएम 01पी और 02पी