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बाढ़ की तबाही से बचा सकती है ‘परकोपाइन’

Mon, 15 Jul 2013 08:36 AM IST
दीपक मिश्रा
दीपक मिश्रा Updated Mon, 15 Jul 2013 08:36 AM IST
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a technic, saving for floods

नदियों का रुख मोड़ने में ‘परकोपाइन’ तकनीक बेहद कारगर है। खर्च के लिहाज से भी यह तकनीक बेहद सस्ती है। इसे आसानी से अपनाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे गंगा और सोलानी नदी के जल प्रवाह में आए परिवर्तन को ठीक किया जा सकता है।

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गंगा और सोलानी नदी का रुख बदलने से इस बार लक्सर क्षेत्र में भारी नुकसान पहुंचा था। सेंट्रल वाटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन, पुणे के ज्वाइंट डायरेक्टर डॉ. महानंद सिंह ने बताया कि उन्होंने लक्सर क्षेत्र में नदियों के पानी से हुए नुकसान वाले इलाकों का जायजा लिया।
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सामने आ सकते हैं घातक परिणाम
अमर उजाला से बातचीत में सिंह ने बताया कि दोनों नदियां सीधी नहीं बह रही हैं। उन्होंने दिशा परिवर्तन किया है। गंगा दायीं तरफ और सोलानी बांये किनारे को बही। गंगा के दायें और सोलानी के बांये किनारे पर गांव होने से बाढ़ आई है। नदियों के रुख में हुए परिवर्तन को ठीक न किया गया तो भविष्य में और घातक परिणाम सामने आ सकते हैं।

उन्होंने बताया कि नदियों के रुख बदलने के लिए ‘परकोपाइन’ तकनीक बेहद कारगर है। यह तकनीक वैसे तो वैज्ञानिक है। लेकिन प्राकृतिक ढंग से यह तकनीक कार्य करती है। तकनीक बेहद सस्ती है और इसे आसानी से अपनाया जा सकता है।

क्या है तकनीक
परकोपाइन तकनीक में 3.5 मीटर लंबाई के छह पोल बनाए जाते हैं, जो देखने मेें रेलवे ट्रैक के स्लीपर जैसे होते हैं। पोल में खास तरह के हुक बनाए जाते हैं। तीन पोल को समकोण की तरह ज्वाइंट कर बेस बनाया जाता है। फिर उनके तीनों कोने पर तीन पोल खड़े किए जाते हैं। इन तीनों पोलों को पिरामिड की तरह जोड़ दिया जाता है। इस तरह से कई पिरामिड बनाए जाते हैं।

नदी के उस किनारे से पिरामिड को जोड़ा जाता है, जिससे उसकी दिशा बदलनी होती है। पिरामिड को आपस में ज्वाइंट करते हुए नदी की ओर ले जाया जाता है। इन पिरामिड पर नदी के बहाव का असर नहीं पड़ता है। धीरे-धीरे इसमें घास, झाड़ियां और रेत आदि अटकना शुरू हो जाता है जो एक प्राकृतिक तटबंध का रूप ले लेता है।


आठ हजार का एक पिरामिड
परकोपाइन तकनीक में जिन पिरामिडों का प्रयोग किया जाता है। उसमें एक पिरामिड की कीमत लगभग आठ हजार रुपये आती है। इन्हें साइट पर ही आसानी से बनाया जा सकता है। पिरामिड के पोल बनाने में सीमेंट, सरिया, कंकरीट, रेत और सरिये आदि का प्रयोग होता है। एक फ्रेम में यह बनाया जाता है।

कोसी पर हो चुका प्रयोग

बिहार में अगस्त 2008 में कोसी नदी के दिशा परिवर्तन होने से भारी तबाही हुई थी। डॉ. महानंद सिंह ने बताया कि कोसी की दिशा ठीक करने के लिए परकोपाइन तकनीक का प्रयोग हुआ था। इसके बाद से कोसी ठीक बह रही है।


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