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भीख नहीं मांगोगे तो शादी में होगी दिक्कत!

Mon, 10 Feb 2014 06:01 PM IST
Updated Mon, 10 Feb 2014 06:01 PM IST
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village of beggars

कानपुर के एक कोने में बसे पनकी क्षेत्र में एक गाँव है - कपड़िया बस्ती। इस गांव का नज़ारा उत्तर भारत के किसी भी पिछड़े गाँव जैसा है - टूटी झोपड़ियां, एक-दो पक्के घर, कच्ची सड़कें, उनके किनारे जमा गन्दा पानी और इधर-उधर खेलते छोटे बच्चे। कुछ नया या अनोखा नहीं दिखता। आबादी क़रीब तीन और चार हज़ार के बीच।

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पर जब आप गाँव में कुछ समय बिताएंगे तो देखेंगे की गाँव के हर पुरूष के चेहरे पर दाढ़ी है। जो लड़के बड़े हो रहे हैं, वे भी अपने चेहरे पर दाढ़ी उगा रहे हैं। यह किसी फ़ैशन की वजह से नहीं है, बल्कि बिना दाढ़ी के कपड़िया बस्ती के लोग ठीक से अपनी रोज़ी रोटी नहीं कमा पाएंगे।
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भारत में एक साधु की पहचान उसके लंबे केश, बढ़ी हुई दाढ़ी और गेरुआ वस्त्र होते हैं। वे दान या भिक्षा पर ही निर्भर रहते हैं। कपड़िया बस्ती का हर घर भिक्षा पर ही चलता है। कपड़िया बस्ती का हर आदमी रोज़ सुबह साधु के वेश में भिक्षा मांगने निकल जाता है। भीख माँगना ही उसका पेशा है।

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'दिल्ली में अक्सर आना जाना'

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बस्ती में रहने वाले राम लाल ने बीबीसी को बताया, "हमारे पूर्वज घूमंतू जीवन जीते थे। वे भिक्षा मांग कर ही खाते थे। एक बार वे कानपुर आकर रुके - क़रीब 150 या 200 साल पहले। उस समय पनकी के ज़मींदार राजा मान सिंह थे। उन्होंने हमारे पूर्वजों से आग्रह किया की वे पनकी में ही बस जाएँ। हमारे पूर्वज यहीं बस गए।"

भिक्षा मांग कर जीने का जो सिलसिला तब शुरू हुआ वह आज भी चल रहा है। हर सुबह कपाड़िया बस्ती का हर आदमी गेरुआ वस्त्र ओढ़ लेता है। माथे पर चंदन लगाता है और एक हाथ में कटोरा और दूसरे हाथ में दंड लेकर निकल पड़ता है भिक्षा मांगने।

राम लाल ने कहा, "हम भिक्षा के लिए कानपुर ही नहीं पूरे भारत का भ्रमण करते हैं। नवरात्रों के समय पश्चिम बंगाल जाते हैं तो गणेश पूजा के वक़्त महाराष्ट्र और कुम्भ मेले में इलाहाबाद।" वे कहते हैं, "दिल्ली में तो हमारा अक्सर आना जाना लगा रहता है," और वे दिल्ली के बड़े मन्दिरों के नाम बताने लगते हैं।

मंदिर में सीखते हैं भीख मांगना

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कपाड़िया बस्ती में रहने वाले 80 वर्षीय प्रताप कहते हैं, "मैं इसी गाँव में पैदा हुआ था। मेरे पिता भी इसी गाँव में पैदा हुए थे। उन्होंने ने भी भिक्षा मांग कर गुज़ारा किया। मैंने भी अपना जीवन भिक्षा मांग के ही चलाया।"

आज प्रताप के चार बेटे भी मंदिरों में भीख मांग के अपना घर चलाते हैं। यह बात प्रताप काफ़ी गर्व के साथ कहते हैं। गाँव का कोई भी व्यक्ति शायद ही पढ़ा-लिखा हो। प्रताप कभी स्कूल गए ही नहीं। राम लाल ने कक्षा एक या दो तक पढ़ाई की है। पर राम लाल अपने कुर्ते की जेब में क़लम ज़रूर रखते हैं।

क्षेत्र के पार्षद अशोक दुबे कहते हैं, "सदियों से कपड़िया बस्ती के लोग भीख मांग कर ही अपना घर चला रहे हैं और आज भी उसी पेशे में हैं।"

गाँव से एक किलोमीटर की दूरी पर एक स्कूल है। गाँव के बच्चे वहाँ सिर्फ़ मिड-डे मील के लिए ही जाते हैं। गाँव के पास ही प्रसिद्ध पनकी हनुमान मंदिर है जहाँ हर मंगलवार हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

अशोक दुबे कहते हैं, "पनकी हनुमान मंदिर को कपड़िया बस्ती के बच्चे अपना ट्रेनिंग सेंटर मानते हैं और भीख मांगने की कला वहीँ सीखते हैं।"

आम बात है नशा करना

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कपड़िया बस्ती के लोग किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं उठा रहे हैं। लोगों को पता ही नहीं कि परिवार नियोजन भी कुछ होता है। 65 वर्षीय केसर बाई 14 बच्चों की माँ है। उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने कितने बच्चों को जन्म दिया है।

अशोक दुबे कहते हैं कि कपड़िया बस्ती के लोग भीख मांग कर अच्छा पैसा कमाते हैं। वो कहते हैं, "अमूमन एक दिन में 500 रुपए तो कमा ही लेते हैं। त्योहार के दिनों में आमदनी बढ़ जाती है। यहाँ का हर आदमी आपको तंदुरुस्त दिखेगा।"

वे आगे कहते हैं, "पर गाँव के लोग पूरा पैसा शराब में ख़र्च कर देते हैं। शाम को जब पैसा कमा कर आते हैं तो सीधे घर नहीं जाते हैं। शराब के ठेके में जाते हैं और ख़ूब पीते हैं। ये शराब को शराब नहीं, शिव जी का प्रसाद मानते हैं।"

अशोक दुबे कहते हैं, "नशे में धुत होकर मार पीट करते हैं। पुलिस का कपड़िया बस्ती में आना एक आम बात है।" गाँव के कुछ ही लोगों के पास बीपीएल राशन कार्ड है।

'भीख मांगने वाले को अहमियत'

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पार्षद अशोक दुबे को लगता है की कपड़िया बस्ती के लोग कभी भी भीख माँगना नहीं छोड़ेंगे। वे कहते हैं, "अगर यहां कोई व्यक्ति दूसरी तरह से जीवन यापन करें तो उसकी क़द्र नहीं होती। जो भीख मांगता है उसे ही महत्त्व दिया जाता है। उसमें कमाई ज़्यादा है। अगर कोई लड़का भीख नहीं मांगता है तो उसकी शादी में दिक़्क़त आती है।"

कानपुर के पीपीएन कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष तेज बहादुर सिंह कहते हैं, "अगर कपड़िया बस्ती के लोग सिर्फ़ भीख मांग कर जी रहे हैं तो वो न समाज को कुछ दे रहे हैं न ही देश को। यह ठीक बात नहीं है।"

वे कहते हैं, "उनमें एक जूनून जगाने की ज़रूरत है ताकि वे इस पेशे को छोड़ें। यह काम सरकार का है। दूसरी सबसे ज़रूरी चीज़ है शिक्षा। लेकिन सरकार की सभी योजनाएं काग़ज़ों तक सीमित रह जाती हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।"

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि कपड़िया बस्ती के लोग भीख मांगना छोड़ना चाहते ही नहीं है।" कपड़िया बस्ती से कुछ ही दूर पर है कानपुर के कई औद्योगिक क्षेत्र हैं - पनकी, फ़ज़ल गंज और दादा नगर औद्योगिक क्षेत्र।

कपड़िया बस्ती के लोग क्यों नहीं मिल या कारख़ानो में काम करते हैं? इस सवाल के जवाब में तेज बहादुर सिंह कहते हैं, "उन्हें समय पर जाना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा, अफ़सर की डाँट खानी पड़ेगी, इन सबसे आसान तरीक़ा है - भीख मांग के जीओ।"

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