Ram Mandir Ayodhya: 'जब आंखें खुलीं तो सामने पड़ा था रामभक्तों की लाशों का ढेर'
बड़ा भयावह था दो नवंबर 1990 का वो दिन, जिसे याद कर वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा की आंखें आज भी भर आईं। रुंधे गले से वह बताते हैं कि उस समय वह बनारस में कार्यरत थे। कानपुर से संपादक का फोन आया और उन्हें बताया गया कि कारसेवकों का जत्था अयोध्या के लिए प्रस्थान कर रहा है।
आप कवरेज की लिए अयोध्या जाओ। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। अयोध्या जाने वाली हर सड़क सील कर दी गई थी। हर तरफ कर्फ्यू लगा हुआ था। दिल दहला देने वाले मंजर को याद करते हुए पदमपति शर्मा बताते हैं कि एक्रीडेशन कार्ड लेने के बाद वो अयोध्या के लिए रवाना हुए। हालांकि सूबे के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह का ये दावा था कि सुरक्षा इतनी सख्त है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
अयोध्या में रामभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा था। घरों से, मठों से बड़ी तादात में कारसेवक पहुंचे थे। इन्हीं कार सेवकों में कोठारी बंधु भी थे। उन्होंने उस दिन ढांचे की बुर्ज पर चढ़कर केसरिया ध्वज लहराया था। मनहूस दो नवंबर की सुबह परमहंस रामचंद्र दास के दिगंबर अखाड़े में मैं और आशीष बागची पहुंचे।
जब उन्होंने कोठारी बंधु से पूछा कि आपको डर नहीं लग रहा कि आज कुछ हो जाएगा तो उस पर उनका जवाब था कि राम के चरणों में उनकी सेवा के लिए आए हैं। कुछ हो भी जाए तो राम के नाम होगा। कवरेज के लिए जितने भी पत्रकार गए थे, वे हनुमानगढी चौराहे पर स्थित एक छोटे से एक मंजिल के मकान की छत पर चढ़ कर पूरी घटना पर नजर बनाए हुए थे।
इतने में पुलिस का बड़ा दल आया और अचानक से आंसू गैस के गोले बरसाने लगे। आंखों में इतनी जलन हुई कि सबकी आंखें बंद हो गईं और उन बंद आंखों के बीच सुनाई दे रही थीं ताबड़तोड़ चलती गोलियों की आवाज। जब आंखें खुलीं तो सामने पड़ा था रामभक्तों की लाशों का ढेर।
वो दौड़ते हुए उन लाशों के बीच जब पहुंचे तो उन्हीं लाशों में कोठारी बंधुओं के मृत शरीर भी पड़े थे। उन लाशों के ढेर में एक शरीर जिंदा था, जो जोधपुर के मेजर अरोड़ा का था। उन्होंने अपनी रिवाल्वर निकालकर मुझे दी और कहा कि किसी पुलिस वाले को देना।
पदमपति शर्मा ने बताया कि जब मैंने उनसे पूछा कि आपने इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया तो मेजर अरोड़ा का कहना था, यहां तो मैं रामकाज में आया था, गोली चलाने नहीं। 1990 की उस कार्तिक पूर्णिमा के दिन सरयू ने स्वयं रामभक्तों के रक्त से स्नान किया था। आगे बताते हैं कि हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था।
अयोध्या के किसी भी मंदिर में उस दिन दिया नहीं जला था। भगवान के दरबार में भी मातम पसरा था। उनका कहना था कि वो रामभक्त, वहां भजन-कीर्तन कर रहे थे, ऐसे में उन बेकसूर लोगों पर गोली बरसाना किस तरह से न्याय संगत था।