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काशी में कछुओं का तो संरक्षण होगा, पर आबादी खतरे में

Sat, 12 Mar 2016 02:45 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Sat, 12 Mar 2016 02:45 AM IST
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Kashi in the conservation of sea turtles, the population at risk
काशी में कछुआ सेंचुरी का सच
केंद्र सरकार की योजना से काशी में कछुओं का संरक्षण और संवर्धन हो ना हो लेकिन गंगा घाटों की आबादी पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। न कछुए हैं न अंडे, फिर भी उनके संरक्षण के नाम पर लगे प्रतिबंधों के चलते राजघाट से रामनगर के बीच नौ मीटर तक बालू की ऊंचाई बढ़ गई है। इससे जल दबाव के कारण तटीय क्षेत्रों में भयावहता के संकेत मिलने लगे हैं।
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कई घाटों में पांच मीटर तक बन चुकी गहरी सुरंगों को लेकर गहरी चिंता जता चुके गंगा प्रयोगशाला के पूर्व कोआर्डिनेटर और महामना मालवीय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी फॉर गंगा मैनेजमेंट के निदेशक प्रो. यूके चौधरी ने अब अस्सी-नगवा क्षेत्र में गंगा के किनारा छोड़ने का खुलासा किया है।उनका कहना है कि इससे आबादी के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।  

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 प्रो. चौधरी ने केंद्रीय जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारती को अपनी अध्ययन रिपोर्ट भेजी है। इसमें उन्होंने सलाह दी है कि गंग तट पर बसी पुरानी काशी को बचाना है तो कछुआ सेंक्चुरी में बालू खनन की अनुमति देकर टीलों को समतल कराया जाए। नहीं तो आने वाले वर्षों में घाटों के साथ ही तट से लगी बस्तियों के बीच धंसान शुरू हो जाएगी। घाटों के झुकने के लक्षण अभी से कई जगह नजर आने लगे हैं।

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प्रो. चौधरी का कहना है कि अगर सेंक्चुरी क्षेत्र से बालू खनन कराकर दूसरे पाट को समतल नहीं कराया गया तो आने वाले वर्षों में गंगा किनारे मिट्टी के आंतरिक क्षरण से प्राचीन तटीय नगरी को बड़े नुकसान का सामना कर पड़ सकता है।  अपने अध्ययन में उन्होंने कहा है कि गंगा अस्सी घाट से पूरब की ओर खिसक गई है। इस वजह से नगवा नाले के गंदे पानी का ठहराव हो रहा है और दुर्गंध उठने लगी है। वहां का जल काला पड़ गया है। इस परिवर्तन से अस्सी से लेकर नगवा तक का पांच सौ मीटर से अधिक किनारा प्रभावित हुआ है। पक्के घाट को एक तरफ गंगा छोड़ रही है और दूसरी ओर कछुआ सेंक्चुरी क्षेत्र में बालू का विस्तार हो रहा है।

 
पहले जहां सेंक्चुरी में बालू क्षेत्र की लंबाई सात किलोमीटर थी, वहीं अब आठ किलोमीटर हो गई है। मालवीय पुल से उत्तर 400 मीटर से अधिक बालू क्षेत्र का विस्तार हुआ है। उनका कहना है एक तरफ बालू का विस्तार और दूसरी ओर गंगा के घाट छोड़ने से पंचगंगा, रामघाट, जटार घाट, मणिकर्णिका घाट इलाके में तटीय सतह की मिट्टी के आंतरिक क्षरण में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसे रोकने का सिर्फ एक ही उपाय है कि उस पार कछुआ सेंक्चुरी क्षेत्र से बालू के दबाव को खनन कराकर कम कराया जाए।

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