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स्त्रियों में सेक्स की आजादी बना मुद्दा

Wed, 30 Jan 2013 09:54 AM IST
आलोक पराड़कर/लखनऊ
आलोक पराड़कर/लखनऊ Updated Wed, 30 Jan 2013 09:54 AM IST
sexual freedom make issue in women

क्या यह स्त्री की आजादी का नया परचम है जो जयपुर से लेकर लखनऊ तक लहरा रहा है, क्या स्त्री उन मुद्दों को लेकर अधिक मुखर हो रही है जिन पर अभी तक संकोच का परदा था या फिर यह गंभीर मुद्दों से हटकर महज सुर्खियां बटोरने का सोचा समझा उपक्रम? कुछ तो है जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है।



जयपुर के साहित्य सम्मेलन में अगर प्रीता भार्गव पुरुषों की तरह स्त्री की सेक्स की आजादी की बात कर रही हैं तो लखनऊ में दो वर्ष के प्रतिबन्ध के बाद हिन्दी और अंग्रेजी में ‘वेजाइना मोनोलॉग्स’ का मंचन हो रहा है। यह दीगर बात है कि अपनी अनूठी संस्कृतियों को संजोए इन शहरों के लिए इन्हें जज्ब कर पाना मुश्किल हो रहा।

 
लखनऊ में तो विवाद एक पखवारे बाद भी नहीं थमा था। यह जानते हुए भी कि ‘वेजाइना मोनोलॉग्स’ नाटक करीब एक दशक से मुम्बई में मंचित होता आ रहा है, लखनऊ में इसे लेकर जैसी हलचल और प्रतिक्रिया हुई है, वैसा अनुभव नाटक के दल को शायद ही कहीं और हुआ होगा।
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2010 में इसका जब मंचन होना था, वयस्क नाटक की शर्तों का पालन न करने के आरोप में प्रदेश के संस्कृति विभाग ने इसके मंचन पर रोक लगा दी थी। मामला कोर्ट में चल ही रहा था कि मुख्यमंत्री की मध्यस्थता, मुकदमा वापस लेने और तमाम शर्तों के बीच गत 14 जनवरी को इसके हिन्दी और अंग्रेजी में मंचन हो गये।

‘किस्सा योनि का’ और ‘वेजाइना मोनोलॉग्स’ शीर्षकों के साथ हुए इसके मंचन में जब योनि के देश भर में प्रचलित तरह-तरह के नामों, उनसे जुड़ी गालियों, उससे जुड़ी स्त्रियों की धारणाओं और समस्याओं, स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों का वर्णन हुआ तो वह नगर के रंगमंच के दर्शकों के लिए बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला अनुभव था। लखनऊ के लिए किसी अप्रत्याशित घटना की तरह रहे इस नाटक को लेकर विरोध लगातार चल रहा है।

औरतों को नये बाजार के लिए तैयार करने की प्रवृत्ति
मंगलवार को नगर के प्रमुख संस्कृतिकर्मियों ने इस पर संगोष्ठी भी बुलायी। संगोष्ठी में मुख्य स्वर नाटक के विरोध का था हालांकि ज्यादातर लोग नाटक पर प्रतिबन्ध के पक्ष में नहीं थे। भारतेन्दु नाट्य अकादमी के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ का कहना था कि यह प्रवृत्ति वास्तव में स्त्री की आजादी की नहीं, औरतों को एक नये बाजार के लिए तैयार करने की है, जिससे उन्हें एक नयी गुलामी में ढकेला जा सके।

वह कहते हैं कि ऐसे ही विषय पर बहुत ही सृजनात्मक नाटक सुरेन्द्र वर्मा का ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ है जो 70 के दशक से चल रहा है और जिसके मंचन को तमाम पुरस्कार मिले हैं। हालांकि भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के प्रदेश सचिव राकेश का कहना था कि नाटक ने कुछ सवाल जरूर उठाए लेकिन अगर इसमें द्वंद्वात्मकता होती और इसे अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया जाता तो यह एक महत्वपूर्ण नाटक बन सकता था।

‘गांधी और अम्बेडकर’ जैसे चर्चित नाटक लिखने वाले राजेश कुमार का कहना था कि नाटक में स्त्री के जिस सवाल को उठाया गया है वह उसके विरोध में नहीं जा पाता है। निर्देशक ने जिन गालियों का इस्तेमाल किया है वह भी स्त्रियों को लेकर हैं। हालांकि कवयित्री सुशीला पुरी ने नाटक का पक्ष लेते हुए कहा कि यह स्त्री की स्वतंत्रता को लेकर नाटक था।

2010 में लगा था प्रतिबंध
लखनऊ में 2010 में नाटक ‘वेजाइना मोनोलॉग्स’ पर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग ने तब प्रतिबंध लगा दिया था जब अधिकारियों को यह पता चला था कि नाटक के प्रचार और निमंत्रण में कहीं यह उल्लेख नहीं किया गया कि यह वयस्कों के लिए है। इसके विरोध में आयोजक न्यायालय में चले गये थे। 14 जनवरी 2013 को रेपटवा नाट्य समारोह में इसका मंचन कई शर्तों के साथ हुआ।

इस बार निमंत्रण और प्रचार में इस बात का बराबर उल्लेख किया गया कि यह नाटक वयस्कों के लिए है। नाटक के प्रवेश के दौरान इस बात की जांच भी की जा रही थी। मूलत: इव एंस्लर के लिखे इस विदेशी नाटक को महाबानो मोदी ओटवाल के निर्देशन में मंचित नाटक में निर्देशिका के अतिरिक्त डॉली ठाकुर, दिलराज ईरानी, रसिका दुगल भूमिकाओं में थी।  

सीएम से हरी झंडी का दावा
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नाटक की पात्र और सामाजिक कार्यकर्ता डॉली ठाकुर ने एक सार्वजनिक समारोह में बताया कि उनके नाटक को पिछली सरकार में प्रतिबन्धित कर दिया गया था। श्री यादव ने इस पर उनसे नाटक का मंचन कराने को कहा था।

ओढ़नी का परचम अभियान
उसी मजाज लखनवी के नगर में जिन्होंने कहा था- ‘तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था’, एक अन्तरराष्ट्रीय अभियान के तहत 14 फरवरी को औरतों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने और पितृसत्ता से उपजी सोच के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए लखनऊ में बेगम हजरत महल पार्क से जीपीओ तक ओढ़नी का परचम अभियान के तहत ओढ़नियों की श्रृंखला बनायी जाएगी। यह संयोग ही है कि वन बिलियन राइजिंग (उमड़ते सौ करोड़) नामक इस अभियान की औपचारिक शुरूआत अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर द ‘वेजाइना मोनोलॉग्स’ नाटक के लेखक इव एंस्लर द्वारा किया जाएगा।


'मुक्ति वहीं से होगी जहां बेड़ियों ने सबसे ज्यादा घाव किये'
‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव का कहना है कि स्त्री को जिन-जिन बातों पर सताया गया है, रोका गया है, वे सबसे बड़े बिंदु सेक्स को लेकर हैं। स्वतंत्रता या मुक्ति वहीं से होगी जहां बेड़ियां सबसे ज्यादा घाव करती है। स्त्री के बंधन सेक्स की इच्छाओं को लेकर हैं। गालियां स्त्री के अंगों को लेकर होती है। अगर स्त्री विरोध करती है तो उसका मुद्दा सेक्स ही होगा। ये उसी विद्रोह की अभिव्यक्ति है। स्वाभाविक है यह पुरुषों को अच्छा नहीं लगेगा और वे उसे गालियां देंगे।

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