खजाने वाले राजा को तीन बार दी गई थी फांसी

नीरज शर्मा/उन्नाव Updated Sat, 26 Oct 2013 01:20 PM IST
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raja rao bakhs singh hanged thrice

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बैसवारा के क्रांतिकारी राव राम बक्स सिंह को एक घंटे तक फांसी पर लटकाने का आदेश हुआ था। 17 दिसंबर 1858 को फांसी पर लटकाए जाने के आदेश के एक साल 11 दिन बाद 28 दिसंबर 1858 को राव साहब को उसी जगह पर फांसी दी गई जहां उन्होंने अंग्रेजों को मारा था।
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राव साहब की इच्छा के अनुसार फांसी के दिन ही बक्सर के लंबरदार देशराज सिंह को उनका शव अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया गया।
इतिहासवेत्ता डॉ. वासुदेव सिंह ने राव राम बक्स सिंह के इतिहास और फांसी दिए जाने के संबंध में अपनी किताब में विस्तृत लिखा है। 29 जून 1857 में राव रामबक्स सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने डिल्लेश्वर मंदिर में जान बचाने के लिए घुसे 12 अंग्रेजों को जिंदा जलाया था।
इसमें जनरल डीलाफौस समेत आठ की मौत हो गई थी। बाकी चार लोग भाग निकले थे। इन अंग्रेजों को राव रामबक्स सिंह के खानदान के और राव साहब के कट्टर दुश्मन मुरारमऊ के राजा दुर्विजय सिंह ने संरक्षण दिया था। राव साहब की मौत के बाद दुर्विजय सिंह को अंग्रेजों ने स्वामिभक्ति के पुरस्कार के रूप में डौंडिया खेड़ा दिया था।

तीन बार फंदा टूटने की प्रचलित है कहानी
क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि उनके पूर्वजों ने बताया था कि जब अंग्रेज राव साहब को फांसी लगा रहे थे तो तीन बार फंदा टूटा था। इसके बाद राव साहब ने शंकर भगवान को नमन कर उनकी माला को शरीर से दूर कर दिया। इसके बाद ही अंग्रेज फांसी लगा पाए थे।

फांसी के बाद का सरकारी पत्र
जिला रायबरेली के असिस्टेंट कमिश्नर सीके क्रेमिलन ने 28 दिसंबर 1859 को बाबू रावबक्स सिंह को फांसी दिए जाने का प्रमाण पत्र जारी किया।

इसमें लिखा है, ‘मैं यहां पर भली भांति प्रमाणित करता हूं कि रामबक्स आत्मज बसंत सिंह पर मृत्युदंड दिए जाने की आज्ञा पूर्ण रूप से कार्यान्वित की गई और यह कि कथित रामबक्स सिंह आत्मज बसंत सिंह को ध्वस्त मंदिर के समीप जहां यूरोपियनों को मारा गया था आज बुधवार 28 दिसंबर 1859 को गले में फंदा डालकर तब तक लटकाया गया जब तक कि वह मर नहीं गया।

उसके शरीर को पूरे एक घंटे तक लटकते रहने पर भी तब तक नीचे नहीं उतारा गया जब तक कि स्वयं मैंने निरीक्षण कर यह नहीं सुनिश्चित कर लिया कि उसके शरीर में प्राण नहीं रहे।

फांसी पर झुलाए जाने के 10 मिनट बाद मैंने डोम को आदेश दिया कि वे रामबक्स के सिकुड़े हुए पैरों को सीधा कर दें। उन्होंने पैरों को इतनी जोर से खींचा कि रस्सी टूट गई। किंतु दूसरी रस्सी तैयार थी।

बस शरीर को पांच मिनट के अंदर पुन: लटका दिया गया और फिर कोई दुर्घटना, त्रुटि अथवा दुर्भाग्यपूर्ण बात नहीं हुई।

मैं पुन: प्रमाणित करता हूं कि रामबक्स के मृत शरीर को नीचे उतारकर रामबक्स की प्रार्थनानुसार ही बक्सर के लंबरदार देशराज सिंह को आज 28 दिसंबर 1859 को इस न्यायालय के राजकीय प्रमाण पत्र के साथ मेरे हाथों दे दिया गया।’
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