श्रद्धासुमन को तरसी रामप्रसाद बिस्मिल की कर्मभूमि

आगरा/ब्यूरो Updated Thu, 20 Dec 2012 11:00 AM IST
people forget to tribute to ramprasad bismil
देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले काकोरी कांड के हीरो रामप्रसाद बिस्मिल की कर्मभूमि के खंडहरों में आज भी गौरवशाली इतिहास झांक रहा है। 19 दिसंबर को इस क्रांतिकारी की भूमि श्रद्धासुमन को तरसती रही लेकिन किसी ने यहां की सुध लेना जरूरी नहीं समझा। जबकि देश के इस लाल का वतन की आजादी में अभूतपूर्व योगदान रहा है।

19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर झूले पं. रामप्रसाद बिस्मिल के जोधापुरा में खंडहर बना घर बुधवार को सूना पड़ा रहा। न तो किसी नेता को और ना ही किसी समाज सेवी संस्था से जुड़े नुमाइंदे को इस महान क्रांतिकारी को याद करने की फुर्सत मिली।

15 अगस्त और 26 जनवरी को राष्ट्रभक्ति के गीत गाने-गुनगुनाने वालों को भी श्रद्धासुमन अर्पित करने का वक्त नहीं मिला। क्रांति के दिनों में गेंदालाल दीक्षित के सानिध्य में राष्ट्रभक्ति की धारा बहाने वाले बिस्मिल की कर्मभूमि सहेजने की बात करने वाले इस महान क्रांतिकारी को ही भूल गए।

अमर उजाला की संघर्ष गाथा और वीरगाथा में रामप्रसाद बिस्मिल की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान के बीच इतिहास को करीब से देखने वाले भी जोधापुरा गांव में नहीं दिखे।

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