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यूपी: प्राथमिक स्कूलों में अब नहीं रखे जाएंगे शिक्षामित्र

Fri, 09 Aug 2013 08:53 AM IST
इलाहाबाद/ब्यूरो
इलाहाबाद/ब्यूरो Updated Fri, 09 Aug 2013 08:53 AM IST
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no shikshamitra in up primary schools

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षामित्रों की नियुक्ति नहीं करने के सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट की मोहर लग गई है।

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तीन जजों की पूर्णपीठ ने इस विधिक प्रश्न का समाधान करते हुए कहा है कि दो जून 2010 का शासनादेश आने के बाद चयनित शिक्षामित्रों को नियुक्ति पाने का अधिकार नहीं रहा।

पूर्णपीठ ने यह भी तय किया कि चयन हो जाने का मतलब नियुक्ति पाने का हकदार होना नहीं है। दो जून के शासनादेश द्वारा प्रदेश सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षामित्रों की तैनाती की योजना वापस ले ली है।
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कोर्ट ने इसे सरकार का नीतिगत मामला बताते हुए कहा कि इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

हाईकोर्ट में सैकड़ों शिक्षामित्र अभ्यर्थियों ने याचिका दाखिल कर कहा कि वर्ष 2009-10 सत्र के लिए उनका चयन शिक्षामित्र के लिए किया गया। चयनित होने के बाद उनको न तो प्रशिक्षण पर भेजा गया और न ही नियुक्ति दी गई।
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प्रदेश सरकार ने दो जून 2010 को शासनादेश जारी कर शिक्षामित्रों की योजना ही वापस ले ली है। याचियों का तर्क था कि चूंकि उनका चयन दो जून 2010 से पूर्व हो चुका है इसलिए उनको नियुक्ति पाने का अधिकार है। सरकार के निर्णय का भूतलक्षी प्रभाव नहीं हो सकता है।

प्रकरण को एकल न्यायपीठ ने पूर्णपीठ के लिए इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए संदर्भित किया क्या शासनादेश जारी होने के बाद पूर्व में चयनित हो चुके शिक्षामित्रों को नियुक्ति पाने का अधिकार है अथवा नहीं।

प्रदेश सरकार का कहना था कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के प्रभाव में आ जाने के कारण और एनसीटीई द्वारा न्यूनतम अर्हता निर्धारित कर देने के बाद शिक्षामित्र योजना को वापस लेने की आवश्यकता महसूस की गई।

न्यायमूर्ति विनीत सरन, न्यायमूर्ति प्रकाश कृष्ण और न्यायमूर्ति संजय मिश्र की पूर्णपीठ ने प्रकरण सुनवाई करते हुए कहा कि शिक्षामित्र नियमित कर्मचारी नहीं हैं।


वह 11 माह की संविदा पर नियुक्त होते हैं और यदि उनका कार्य संतोषजनक रहा तो अगले सत्र के लिए पुन: 11 माह हेतु उनका कार्यकाल बढ़ा दिया जाता है।

मौजूदा प्रकरण में याचीगण पूर्णरूप से चयनित नहीं हैं और यदि चयनित भी होते तो उससे नियुक्ति पाने का अधिकार उत्पन्न नहीं होता है।

यहां तक कि ग्रामशिक्षा समितियों ने जिन लोगों के नामों की संस्तुति दो जून 2010 से पूर्व कर दी थी उनको भी नियुक्ति पाने का अधिकार नहीं है। पूर्णपीठ ने इस निरीक्षण के बाद प्रकरण वापस एकल न्यायाधीश के पास भेज दिया है।

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