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बयान पर बयान देकर कैसी सियासत कर रहे मुलायम?

Wed, 07 Aug 2013 08:25 AM IST
अखिलेश वाजपेयी
अखिलेश वाजपेयी Updated Wed, 07 Aug 2013 08:25 AM IST
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mulayam politics in up

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चंद दिन पहले बयान दिया था कि उन्हें अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने पर अफसोस है।

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सियासी हलकों में इस बयान के निष्कर्ष निकाले ही जा रहे थे कि नोएडा में आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन पर उनका बयान आ गया।

इस बार उन्होंने कहा, एसडीएम ने जिस तरह मस्जिद की दीवार गिरवाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा कराने की कोशिश की, उसे देखते हुए अखिलेश सरकार ने दुर्गा का निलंबन करके अच्छा काम किया है।

राजनीतिक समीक्षकों से लेकर जनता के बीच एक बार चर्चा फिर मुलायम की छवि पर शुरू हो गई। लोगों को लगा कि मुलायम बदले नहीं है। वह किसी भी कीमत पर मुस्लिम वोट पाना चाहते हैं।
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यह चर्चाएं भी किसी निष्कर्ष पर पहुंचतीं कि मुलायम ने अब दावा कर दिया है कि अयोध्या में 6 दिसंबर को ढांचा ढहने की जानकारी तत्कालीन राष्ट्रपति को पहले से थी।
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मुलायम का ताजा बयान उनकी तरफ से कांग्रेस पर हमले के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक समीक्षकों का निष्कर्ष है कि सपा मुखिया ने यह बयान देकर कांग्रेस पर निशाना साधने और उसे कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

बकौल मुलायम उन्होंने जब राष्ट्रपति से इस मुद्दे पर बातचीत की तो उन्हें भी चुप रहने की सलाह दी गई। साफ है कि सपा मुखिया मुसलमानों को यह समझाना चाहते हैं कि ढांचा ढहने की असली दोषी कांग्रेस ही है।

दरअसल, राजनीति के दांवपेंच के पारखी मुलायम सिंह को इस बात का खतरा दिखने लगा है कि दुर्गाशक्ति नागपाल मामले में मस्जिद की दीवार गिराने का तर्क जिस तरह तूल पकड़ता जा रहा है, उससे विधानसभा चुनाव में सपा के नजदीक आए अगड़ों व पिछड़ों के वोट का बहुत बड़ा हिस्सा अलग हो सकता है।

इसलिए उनकी कोशिश कुछ ऐसा करने की है जो दुर्गा को लेकर बने माहौल को पीछे छोड़ दे। जिससे उन्हें अपनी सरकार को पाकसाफ बताने के लिए बार-बार मस्जिद की दीवार बचाने का तर्क न देना पड़े, क्योंकि सपा रणनीतिकारों को शायद मस्जिद वाले तर्क के तूल पकड़ने से हिंदू वोटों की नाराजगी का खतरा दिखाई देने लगा है।

मुस्लिम वोट जाने से रोकने की भी:
मोदी के चलते उत्तर प्रदेश में जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां व समीकरण बन गए हैं। यह समीकरण व परिस्थितियां भी मुलायम के ताजा बयान के पीछे एक वजह मानी जा रही हैं।

सपा मुखिया को शायद यह आशंका सता रही है कि मोदी को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश का मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ मुड़ सकता है। ऐसा होने पर सबसे ज्यादा नुक सान सपा को ही होगा।

इसलिए वह चाहते हैं कि कांग्रेस की छवि मुस्लिम हितैषी न बनने पाए। उनके ताजा बयान में मुसलमानों को यह समझाने की बेकरारी साफ दिखती है कि कांग्रेस चाहती तो बाबरी मस्जिद का ढांचा बचाया जा सकता था। वह चाहते हैं कि इस मुद्दे पर कुछ ऐसा हो, जिससे कांग्रेस को सफाई देनी पड़े।

पहले जैसी छवि से भी परहेज:
हालात पर नजर दौड़ाएं, तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि उनके ये तीनों बयान उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं। मुलायम सिंह इन बयानों के जरिये वोटों का संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं।

उनकी कोशिश मुस्लिम हितैषी छवि पर खरोंच न लगने देने की है। पर, इस सावधानी के साथ कि किसी भी दशा में 1990 की तरह उन्हें हिंदू विरोधी नेता की शक्ल न दी जा सके। मुलायम जानते हैं कि हिंदू विरोधी नेता की शक्ल उन्हें चुनाव में काफी नुकसान पहुंचा सकती है।

लोकसभा चुनाव में यूपी से 60 सीटें जीतने के उनके लक्ष्य पर पानी फेर सकती है। इसीलिए कभी वह कारसेवकों पर गोली चलने पर पश्चाताप जताते हैं तो नोएडा में दुर्गा नागपाल के निलंबन को मस्जिद की दीवार गिराने की सजा बताने में भी एक क्षण भी नहीं लगाते।


पर, मस्जिद की दीवार गिराने पर सजा वाला बयान ज्यादा तूल पकड़कर उन्हें नुकसान न पहुंचा दे, इसलिए बीच में ही ढांचा गिरने की जानकारी तत्कालीन राष्ट्रपति को होने का दावा करके वह पूरा मामला कांग्रेस की तरफ धकेल देना चाहते हैं।

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