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प्रेमी जोड़ों का सपोर्टिव सिनेमा - 'की एंड का'
अभिनव चौहान / मुरादाबाद
Updated Thu, 31 Mar 2016 08:59 PM IST
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हिन्दी सिनेमा में पिछले तीन साल में ऐसी तमाम फिल्में देखने को मिली हैं जो अपने बेहतरीन कथानक, निर्देशन और अभिनय के बल पर चर्चाओं में रहीं। 50 से 80 के दशक का सिनेमा और 80 के बाद के सिनेमा में बहुत ज्यादा अंतर भले ही न दिखाई दे। लेकिन पिछले एक दशक में हिन्दी सिनेमा में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है।
एक ओर जहां प्रेम कहानियों में नई सोच देखने को मिली है। वहीं सामाजिक मुद्दों और सामयिक मुद्दों को भी हिन्दी सिनेमा ने पूरी गहराई के साथ छूने की कोशिश की है। हिन्दी सिनेमा ने अपने दर्शकों को ऐसी तमाम फिल्में दीं हैं जो उन्हें उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी दिखाई देती हैं। जिन्हें देखकर दर्शक ये एहसास कर सकते हैं कि ये कहानी उनकी अपनी जिदंगी की है। इन फिल्मों में जीवन की वो घटनाएं देखने को मिली जिन्हें समाज स्वीकारने से बेशक इनकार करता रहे लेकिन वह पहले से समाज में मौजूद हैं।
ऐसी फिल्मों ने समाज में एक बड़े विमर्श को जन्म दिया। अब इसी सोच के साथ एक बड़ी बहस और विमर्श की ओर समाज को ले जाने की कोशिश शायद निर्माता, निर्देशक और लेखक आर. बाल्की की फिल्म - 'की एंड का' करने जा रही है। अपने बेहतरीन निर्देशन और लेखन से हिन्दी सिनेमा को कई महत्वपूर्ण फिल्में देने वाले दक्षिण भारतीय निर्देशक आर. बाल्की बेहद गंभीर हैं। 2007 में हिन्दी सिनेमा में चीनी कम के साथ निर्देशन में डेब्यू करने वाले आर. बाल्की ने नई सोच के उस सिनेमा को पर्दे पर दिखाने का प्रयास किया जो कहीं न कहीं समाज के कई लोगों के मन में था।
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एक बुजुर्ग का प्रेम में पड़ जाना बेशक भारतीय सामाजिकता को स्वीकार न हो। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं की उम्र के पड़ाव के बावजूद किसी विपरीत लिंगी की ओर आकर्षण पैदा होना स्वाभाविक है। जिसे बेहद खूबसूरती के साथ आर. बाल्की ने दर्शाया। इसके बाद अभिताभ बच्चन की मुख्य भूमिका वाली फिल्म 'पा' (2009), 'इंग्लिश-विंग्लिश' (2011) 'शमिताभ' (2015) जैसी बेहद सॉफ्ट और गंभीर फिल्मेें देने के बाद भारतीय समाज की एक बड़ी रुढ़िवादी सोच को चुनौती देती फिल्म की एंड का के साथ आर. बाल्की अपने दर्शकों को काफी कुछ नया देने वाले हैं।
फिल्म का फर्स्ट लुक ही आपको सिनेमाघरों की ओर ले जाने को काफी है। जहां भारतीय समाज के पुरुषों को जीविकोपार्जन और महिलाओं को घर के कामकाज की जिम्मेदारी घोषित रूप से दी जाती है। उसमें की एंड का एक नए नजरिये को जन्म देती है। हिन्दी सिनेमा मेें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली महिलाओं पर केंद्रित फिल्में भी कई आई हैं। लेकिन की एंड का उन सबसे अलग है। वजह साफ है, क्योंकि फिल्म का नायक कबीर (अर्जुन कपूर) पूरी तरह से घर के कामकाज को संभालता है और नायिका किया (करीना कपूर) पूरी तरह से आत्मनिर्भर महिला है और विवाह के बाद वो ही घर खर्च की जिम्मेदारियों को संभालती है।
भारतीय परिवारों में जहां एक लड़का-लड़की में प्रेम होने के बाद भी लड़के की आर्थिक मजबूती उसकी प्रेमिका के साथ उसके भविष्य की संभावनाओं को तय करती है, वहां ये तय है कि की एंड का को दर्शक फुल मनोरंजन के लिए देखेंगे। लेकिन उसकी संदेश को ग्रहण करने में शायद एक दशक लग जाए। हालांकि नई पीढ़ी की कई युवतियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका पति या बॉयफ्रेंड उनसे कम कमाता है। लेकिन वो बिल्कुल न कमाए और उससे शादी के लिए अपने परिवार वालों को लड़की मनाए ये असंभव ही लगता है।
फिल्म के पहले लुक से लगता है कि फिल्म वैवाहिक जीवन के उतार चढ़ाव को भी छूती है। लेकिन वो असल जिंदगी के कितनी आस-पास रहती है वो तो एक अप्रैल के बाद ही पता चलेगा। उम्मीद है कि फिल्म 150 करोड़ के क्लब में आसानी से शामिल होगी। आर. बाल्की के निर्देशन और लेखन को सराहे बिना भी आप नहीं रह सकेंगे। जिस मुद्दे पर वो फिल्म लेकर आए हैं वो अपनी तरह का नया सवाल है।
हां फिल्म उन प्रेमी जोड़ों के लिए काफी खास हो जाती है जिनके बीच आए दिन सैलरी, जिम्मेदारी, प्रेमिका के परिवार में खुद को इंट्रोड्यूज कराने के लिए मजबूत आर्थिक स्थिति, पद, प्रतिष्ठा, हैसियत के सवालों पर झगड़ा होता है। फिल्म ये दिखाने की भी कोशिश करती है कि जीवन के लिए बेहतर जीवन साथी जरूरी है। परफेक्ट रिलेशनशिप किसी भी एक साथी के आर्थिक मजबूती और दूसरे की भावनात्मक मजबूती से आसानी से चल सकता है।
जहां एक ओर फिल्म स्त्री सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का समर्थन करती है। वहीं ये भी विचार पैदा करती है कि जरूरी नहीं की गृहस्थी में पुरुष ही जीविकोपार्जन का केंद्र हो। आर. बाल्की के चहेतों को फिल्म में काफी कुछ देखने को मिलेगा। ये तय मानकर चलिए कि एक अप्रैल को रिलीज होने के बाद भी फिल्म आपको अप्रैल फूल कतई नहीं बनाएगी। बल्कि एक बेवकूफाना और रूढ़ीवादी सोच से निकलने के लिए जरूर मदद कर सकती है।
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एक ओर जहां प्रेम कहानियों में नई सोच देखने को मिली है। वहीं सामाजिक मुद्दों और सामयिक मुद्दों को भी हिन्दी सिनेमा ने पूरी गहराई के साथ छूने की कोशिश की है। हिन्दी सिनेमा ने अपने दर्शकों को ऐसी तमाम फिल्में दीं हैं जो उन्हें उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी दिखाई देती हैं। जिन्हें देखकर दर्शक ये एहसास कर सकते हैं कि ये कहानी उनकी अपनी जिदंगी की है। इन फिल्मों में जीवन की वो घटनाएं देखने को मिली जिन्हें समाज स्वीकारने से बेशक इनकार करता रहे लेकिन वह पहले से समाज में मौजूद हैं।
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ऐसी फिल्मों ने समाज में एक बड़े विमर्श को जन्म दिया। अब इसी सोच के साथ एक बड़ी बहस और विमर्श की ओर समाज को ले जाने की कोशिश शायद निर्माता, निर्देशक और लेखक आर. बाल्की की फिल्म - 'की एंड का' करने जा रही है। अपने बेहतरीन निर्देशन और लेखन से हिन्दी सिनेमा को कई महत्वपूर्ण फिल्में देने वाले दक्षिण भारतीय निर्देशक आर. बाल्की बेहद गंभीर हैं। 2007 में हिन्दी सिनेमा में चीनी कम के साथ निर्देशन में डेब्यू करने वाले आर. बाल्की ने नई सोच के उस सिनेमा को पर्दे पर दिखाने का प्रयास किया जो कहीं न कहीं समाज के कई लोगों के मन में था।
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एक बुजुर्ग का प्रेम में पड़ जाना बेशक भारतीय सामाजिकता को स्वीकार न हो। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं की उम्र के पड़ाव के बावजूद किसी विपरीत लिंगी की ओर आकर्षण पैदा होना स्वाभाविक है। जिसे बेहद खूबसूरती के साथ आर. बाल्की ने दर्शाया। इसके बाद अभिताभ बच्चन की मुख्य भूमिका वाली फिल्म 'पा' (2009), 'इंग्लिश-विंग्लिश' (2011) 'शमिताभ' (2015) जैसी बेहद सॉफ्ट और गंभीर फिल्मेें देने के बाद भारतीय समाज की एक बड़ी रुढ़िवादी सोच को चुनौती देती फिल्म की एंड का के साथ आर. बाल्की अपने दर्शकों को काफी कुछ नया देने वाले हैं।
फिल्म का फर्स्ट लुक ही आपको सिनेमाघरों की ओर ले जाने को काफी है। जहां भारतीय समाज के पुरुषों को जीविकोपार्जन और महिलाओं को घर के कामकाज की जिम्मेदारी घोषित रूप से दी जाती है। उसमें की एंड का एक नए नजरिये को जन्म देती है। हिन्दी सिनेमा मेें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली महिलाओं पर केंद्रित फिल्में भी कई आई हैं। लेकिन की एंड का उन सबसे अलग है। वजह साफ है, क्योंकि फिल्म का नायक कबीर (अर्जुन कपूर) पूरी तरह से घर के कामकाज को संभालता है और नायिका किया (करीना कपूर) पूरी तरह से आत्मनिर्भर महिला है और विवाह के बाद वो ही घर खर्च की जिम्मेदारियों को संभालती है।
भारतीय परिवारों में जहां एक लड़का-लड़की में प्रेम होने के बाद भी लड़के की आर्थिक मजबूती उसकी प्रेमिका के साथ उसके भविष्य की संभावनाओं को तय करती है, वहां ये तय है कि की एंड का को दर्शक फुल मनोरंजन के लिए देखेंगे। लेकिन उसकी संदेश को ग्रहण करने में शायद एक दशक लग जाए। हालांकि नई पीढ़ी की कई युवतियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका पति या बॉयफ्रेंड उनसे कम कमाता है। लेकिन वो बिल्कुल न कमाए और उससे शादी के लिए अपने परिवार वालों को लड़की मनाए ये असंभव ही लगता है।
फिल्म के पहले लुक से लगता है कि फिल्म वैवाहिक जीवन के उतार चढ़ाव को भी छूती है। लेकिन वो असल जिंदगी के कितनी आस-पास रहती है वो तो एक अप्रैल के बाद ही पता चलेगा। उम्मीद है कि फिल्म 150 करोड़ के क्लब में आसानी से शामिल होगी। आर. बाल्की के निर्देशन और लेखन को सराहे बिना भी आप नहीं रह सकेंगे। जिस मुद्दे पर वो फिल्म लेकर आए हैं वो अपनी तरह का नया सवाल है।
हां फिल्म उन प्रेमी जोड़ों के लिए काफी खास हो जाती है जिनके बीच आए दिन सैलरी, जिम्मेदारी, प्रेमिका के परिवार में खुद को इंट्रोड्यूज कराने के लिए मजबूत आर्थिक स्थिति, पद, प्रतिष्ठा, हैसियत के सवालों पर झगड़ा होता है। फिल्म ये दिखाने की भी कोशिश करती है कि जीवन के लिए बेहतर जीवन साथी जरूरी है। परफेक्ट रिलेशनशिप किसी भी एक साथी के आर्थिक मजबूती और दूसरे की भावनात्मक मजबूती से आसानी से चल सकता है।
जहां एक ओर फिल्म स्त्री सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का समर्थन करती है। वहीं ये भी विचार पैदा करती है कि जरूरी नहीं की गृहस्थी में पुरुष ही जीविकोपार्जन का केंद्र हो। आर. बाल्की के चहेतों को फिल्म में काफी कुछ देखने को मिलेगा। ये तय मानकर चलिए कि एक अप्रैल को रिलीज होने के बाद भी फिल्म आपको अप्रैल फूल कतई नहीं बनाएगी। बल्कि एक बेवकूफाना और रूढ़ीवादी सोच से निकलने के लिए जरूर मदद कर सकती है।